पीठ ने कहा, इसके लिए अधिकारी सैटेलाइट से तस्वीरें प्राप्त करने या ड्रोन से फोटोग्राफी कराने के लिए सरकारी एजेंसियों की मदद ले सकते हैं। पीठ ने यह निर्देश एक लंबित जनहित याचिका पर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को अहम निर्देश में कहा कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्य में संरक्षित वन के सीमांकन रेखा से कम से कम एक किलोमीटर के दायरे में किसी भी प्रकार के निर्माण और खनन को मंजूरी नहीं दी जा सकती।
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जस्टिस एल नागेश्वर राव, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस एएस बोपन्ना की पीठ ने कहा कि राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के अंदर पारिस्थितिकी संवेदनशील क्षेत्र (इको सेंसिटिव जोन) होना चाहिए। पीठ ने सभी राज्यों और केंद्र शासित क्षेत्रों के मुख्य वन संरक्षक को ईएसजेड के भीतर मौजूद सभी निर्माणों की सूची तैयार करने और तीन माह के अंदर कोर्ट के समक्ष रिपोर्ट पेश करने को कहा है।
पीठ ने कहा, इसके लिए अधिकारी सैटेलाइट से तस्वीरें प्राप्त करने या ड्रोन से फोटोग्राफी कराने के लिए सरकारी एजेंसियों की मदद ले सकते हैं। पीठ ने यह निर्देश एक लंबित जनहित याचिका पर दिया। ‘टीएन गोडावर्मन बनाम यूनियन ऑफ इंडिया’ शीर्षक वाली यह याचिका वन संरक्षण के जुड़े मुद्दों पर है। एजेंसी
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पीठ ने कहा- कुकुरमुत्ते की तरह दर्ज हो रहीं जनहित याचिकाएं
पीठ ने जनहित याचिकाओं को लेकर भी सवाल उठाते हुए कहा, ज्यादातर याचिकाएं या तो लोकप्रियता के लिए दाखिल की जा रही हैं या फिर किसी निजी स्वार्थ के लिए। बीते कुछ समय में कुकुरमुत्ते की खेती की तरह जनहित याचिकाएं दाखिल की जा रही हैं। इनमें से ज्यादातर में कोई जनहित नहीं होती है। ये याचिकाएं सिर्फ कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग हैं।