सुप्रीम कोर्ट एक हजार लो-फ्लोर इलेक्ट्रिक बसों की खरीद योजना से संबंधित दिल्ली सरकार के हलफनामे से संतुष्ट नहीं है। हलफनामे को आधा-अधूरा बताते हुए शीर्ष अदालत ने सरकार से छह सप्ताह के अंदर संपूर्ण योजना तैयार करने के लिए कहा है। जस्टिस मदन बी लोकुर और जस्टिस दीपक गुप्ता की पीठ ने दिल्ली सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल पिंकी आनंद से कहा, ‘अपने लोगों से कहिए कि जल्दबाजी न करें क्योंकि जल्दबाजी में आप मुश्किल में पड़ जाएंगे। इस बारे में एक ठोस योजना बनाएं। आप इस मामले में विशेषज्ञों की राय भी ले सकते हैं।
आपके हलफनामे में फंड की उपलब्धता, बस डिपो के लिए जमीन, चार्जिंग स्टेशन, इलेक्ट्रिक बस का स्वरूप तथा अत्याधुनिक परिवहन प्रणाली के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर समग्र योजना होनी चाहिए।’
इस पर आनंद ने अदालत को बताया कि वह पीठ द्वारा उठाए गए मुद्दों को ध्यान में रखते हुए सरकार को तीन महीने में समग्र योजना तैयार करने को कहेगी। पीठ ने इलेक्ट्रिक बसों की खरीद के लिए पर्यावरण क्षतिपूर्ति शुल्क (ईसीसी) से जुटाए गए धन का इस्तेमाल करने के दिल्ली सरकार के प्रस्ताव पर भी सवाल उठाया।
पीठ ने कहा ईसीसी फंड खास उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जाता है। बस खरीद के लिए केंद्र सरकार से मिले धन या बजटीय आवंटन की जगह आप ईसीसी का इस्तेमाल नहीं कर सकते। अखबारों की खबरें बताती हैं कि दिल्ली की सड़कों पर जगह-जगह गड्ढ़े हैं। आप इस धन का इस्तेमाल इन गड्ढें को भरने के लिए तो नहीं कर सकते। इन्हें भरना आपकी जवाबदेही है।
अदालत ने कहा कि सार्वजनिक परिवहन के लिए बजटीय आवंटन से ही बसों की खरीद की जानी चाहिए, न कि ईसीसी के तहत जुटाए गए धन से। आप बसें खरीद रहे हैं, इसमें कोई दिक्कत नहीं है। आपकी बजटीय राशि इसमें इस्तेमाल की जा सकती है।