सुप्रीम कोर्ट ने बच्चे की कस्टडी पर अहम आदेश पारित किया। कोर्ट ने साफ किया कि 14 साल की बच्ची को संपत्ति नहीं माना जा सकता। शीर्ष अदालत में जस्टिस सीटी रवि कुमार और राजेश बिंदल की पीठ ने उस आदेश को निरस्त कर दिया, जिसमें एक लड़की की कस्टडी उसके जैविक पिता को सौंपी गई थी। 14 वर्षीय किशोरी अपनी बुआ के साथ खुशी से रह रही थी। हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाने वाली बुआ की अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, जीवन के इस पड़ाव पर बच्चे की स्थिरता 'सर्वोपरि और सबसे महत्वपूर्ण' है। अदालत की खंडपीठ ने कहा, मार्च 2014 में पैदा हुई बच्ची लगभग तीन महीने की उम्र से ही अपने जैविक पिता की बहन के साथ रह रही है।
बुआ के साथ खुशी से रह रही है बच्ची
अदालत ने साफ किया, यह ऐसा मामला नहीं है जिसमें कोई भी पक्ष गोद लेने का दावा कर रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोहम्मडन कानून के तहत यह स्वीकार्य नहीं है। मुकदमे में शामिल दोनों पक्ष संरक्षक होने का दावा भी नहीं कर रहे हैं। विवाद केवल बच्चे की कस्टडी का है। सोमवार को पारित आदेश में सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा, अदालत ने बच्ची से बातचीत की। वह वर्तमान परिवार (बुआ) के साथ खुशी से रह रही है। अब वह अस्थिर नहीं होना चाहती।
बच्ची के हित पर अदालत की टिप्पणी
शीर्ष अदालत ने कहा कि जब बच्चे की कस्टडी बुआ को सौंपी गई उस समय महिला की शादी नहीं हुई थी। अब महिला दो बच्चों की मां है। यह तथ्य 14 साल की किशोरी को बुआ के साथ रहने देने के फैसले में बाधक नहीं। ऐसा इसलिए क्योंकि बच्ची अपनी बुआ के साथ ही रहना चाहती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बच्ची की उम्र को ध्यान में रखते हुए, अदालत इस राय पर पहुंची है कि 14 साल की आयु में बच्ची का जैविक पिता उसे अपनी संपत्ति नहीं मान सकता। जन्म से ही बच्ची अपने पिता के साथ नहीं रही। ऐसे में अब उसका हित सर्वोपरि है।
2014 में हुआ जुड़वां बच्चों का जन्म
खबर के मुताबिक लड़की की जैविक मां ने 2014 में जुड़वां बच्चों को जन्म दिया था। दंपती ने दो बच्चों में से एक को अपने पास रखा। लड़की को पालने के लिए उसकी नानी को सौंप दिया गया। ओडिशा उच्च न्यायालय में मुकदमे की सुनवाई के दौरान बच्ची तीन महीने तक नानी के पास थी। आदेश पारित होने के बाद बच्ची बुआ को सौंप दी गई।