डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर ही नहीं, बल्कि विदेश में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों पर भी पड़ रहा है। रुपये में लगातार गिरावट से भारतीय छात्रों का विदेश में पढ़ना महंगा हो गया है। पिछले साल एक अक्तूबर की तुलना में रुपये में 7.62 रुपये की गिरावट आ चुकी है और डॉलर में करीब 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। इसका खामियाजा विदेश में पढ़ रहे और पढ़ने जा रहे छात्रों तथा उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, देश के साढ़े पांच लाख से ज्यादा छात्र 80 से ज्यादा देशों में पढ़ते हैं। देश से विदेश जाने वाले कुल 11.33 अरब डॉलर में से 17.8 फीसदी खर्च विदेश में शिक्षा ग्रहण करने में होता है। यह खर्च विदेश में निवेश, संपत्ति खरीदने, दान, घूमने और जमा सहित अन्य से कहीं अधिक है। इनमें बड़ी तादाद में विप्रेषण योजनाओं के तहत छात्र विदेशों में पढ़ने जाते हैं।
4-5 लाख रुपये का अतिरिक्त बोझ
करीब 55 फीसदी छात्र अमेरिका और कनाडा में शिक्षा ग्रहण करने जाते हैं, जबकि शेष अन्य देशों में शिक्षा के लिए जाते हैं। बीते एक अक्तूबर को एक डॉलर की कीमत 72.91 रुपये थी, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 65.29 पर था। अमेरिका में बेटे को गत वर्ष पढ़ाई के लिए भेजने वाले दिल्ली निवासी टीएन मेहरोत्रा के मुताबिक, रुपये के लगातार गिरने से इस साल अतिरिक्त 4 से 5 लाख रुपये का इंतजाम करना पड़ेगा।
शिक्षा ऋण लेने वालों की मुश्किलें बढ़ीं
विशेषज्ञों की मानें, तो विदेश में पढ़ने वाले 50 फीसदी भारतीय छात्र शिक्षा ऋण लेते हैं। ऐसे में रुपये के कमजोर होने से खासतौर पर उन छात्रों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है, जिनकी क्षमता अतिरिक्त धन का इंतजाम करने की नहीं है। आर्थिक विशेषज्ञ अतुल सिंह के मुताबिक, रुपये में गिरावट से आयात-निर्यात, विदेश में निवेश करने वालों, छात्रों और चिकित्सा सेवाएं लेने वालों की परेशानी बढ़ना तय है।
फिलहाल राहत के आसार नहीं
आर्थिक विशेषज्ञ पारुल त्रिपाठी का कहना है कि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें रुपये पर असर डाल रही हैं। देश में बड़े पैमाने पर पेट्रोलियम खपत के लिए इसका निर्यात किया जाता है। इसी वजह से डॉलर मजबूत हो रहा है और रुपया लगातार गिर रहा है। रहा सवाल विदेश में शिक्षा का तो विप्रेषण नीति के तहत जाने वाले सक्षम लोग होते हैं। उन्हें तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ता, लेकिन जो ऋण लेकर पढ़ रहे हैं, उन्हें और उनके परिवार को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि रुपये की चाल में बदलाव की गुंजाइश फिलहाल नहीं है। स्थितियों को संभालने के लिए सरकार निर्यात, विदेशी निवेश सहित विभिन्न स्तरों पर कदम उठा रही है।