टोयोटा एसयूवी गनपाउडर और खून की बदबू से भर गई थी। कॉन्स्टेबल अरुण जाधव गाड़ी के पिछले हिस्से में छुपे हुए थे। वहां बहुत कम जगह थी। जाधव के दाएं हाथ और कंधे में गोली लगी थी और खून निकल रहा था।
सड़क पर हुई फायरिंग में घायल हुए तीन कॉन्स्टेबल उनके ऊपर पड़े थे। इनमें से दो की मौत हो चुकी थी। शहर के एंटी-टेरर यूनिट के इंचार्ज का शव बीच वाली सीट पर था। उनके सीने पर गोली लगी थी।
गाड़ी में बैठे एक पुलिस अधिकारी और इंस्पेक्टर को भी गोली लग गई थी। वहीं, ड्राइवर सीट पर सीनियर इंस्पेक्टर बैठे थे वो भी गोली लगने से स्टेयरिंग पर गिरे हुए थे। वो 26 नवंबर 2008 की शाम थी। भारत की आर्थिक राजधानी और सिनेमा का गढ़ मुंबई दुनिया के सबसे भयावह चरमपंथी हमले की चपेट में थी।
उस शाम को दस हथियारबंद चरमपंथी समुद्र के रास्ते मुंबई पहुंचे थे। ये सभी पाकिस्तान से थे। यहां उतरकर चरमपंथी दो समूहों में बंट गए, एक ने गाड़ी का अपहरण किया और पहले से तय जगहों पर निशाना बनाया।
उन्होंने एक प्रमुख रेलवे स्टेशन, दो लग्जरी होटल, एक यहूदी सांस्कृतिक केंद्र और एक अस्पताल पर हमला किया। चरमपंथियों ने जैसे 60 घंटों तक पूरे शहर को बंधक बना लिया था। मौत के उस तांडव में 166 लोग मारे गए और कई घायल हो गए। इस हमले ने भारत-पाकिस्तान के बीच की दरार को और गहरा कर दिया।
जब अस्पताल पर हुआ हमला
अरुण जाधव और अन्य छह पुलिसकर्मी एक सफेद एसयूवी में 132 साल पुराने उस अस्पताल की तरफ दौड़े जिस पर चरमपंथियों ने हमला कर दिया था। वहां अस्पताल के स्टाफ ने अपनी सूझबूझ से अस्पताल के वार्ड्स पर ताला लगा दिया था ताकि मरीजों की जान बचाई जा सके।
"हमसे पहले पुलिस अस्पताल में घुस चुकी थी। तभी ऊपरी मंजिल से फायरिंग हुई। इसके जवाब में एक सीनियर ऑफिसर ने भी फायरिंग की। इसके बाद बंदूकधारी वहां से भाग गए और अस्पताल के पीछे ताड़ के पेड़ों वाले रास्ते पर छुप गए। तभी वहां पर हमारी एसयूवी पहुंची।"
"हम पहुंचे ही थे कि कुछ ही सेकेंड में चरमपंथियों ने हम पर हमला बोल दिया और गाड़ी के अंदर दो राउंड फायरिंग की।" ये हमला इतना औचक था कि सिर्फ अरुण जाधव ही जवाबी फायरिंग कर पाए बाकी सभी पुलिसकर्मी गोलियों से छलनी हो गए। उन्होंने फायरिंग का जवाब देते हुए गाड़ी की पिछली सीट से बंदूकधारियों को तीन गोलियां मारीं।
बंदूकधारियों ने तुरंत ही आगे और बीच की सीट से तीनों अधिकारियों के शव निकालकर सड़क पर पटक दिए। उनमें से एक ने ये भी कहा कि सिर्फ एक पुलिसवाले ने बुलेट प्रूफ जैकेट पहनी है। इसके बाद वो बाकी शवों को निकालने के लिए पीछे का दरवाजा खोलने लगे लेकिन दरवाजा नहीं खुला।
मोहम्मद अजमल आमिर कसाब और इस्माइल खान को लगा कि पीछे की तरफ चार लाशें पड़ी हैं। असल में, उनमें से एक जिंदा था और दूसरा धीरे-धीरे सांसे ले रहा था। बाकी दो मर चुके थे। तभी अचानक कॉन्स्टेबल योगेश पाटिल की जेब में फोन बजना शुरू हो गया। वे ऑपरेशन पर जाने से पहले उसे साइलेंट करना भूल गए थे।
फोन की आवाज सुनकर कसाब ने पीछे की तरफ फिर से गोलियां चलाईं। गोली बीच की सीट से होते हुए योगेश पाटिल को जा लगी और उनकी मौत हो गई। लेकिन, खून से भीगे और लाशों के बीचे दबे हुए अरुण जाधव के जिंदा होने के बारे में चरमपंथी नहीं जानते थे। वो कहते हैं, "अगर कसाब ने अपनी बंदूक थोड़ा और घुमाई होती तो मैं भी जिंदा नहीं होता।"