मणिपुर पर स्टारलिंक के अवैध नेटवर्क का खतरा।
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मणिपुर की राजधानी इंफाल में सुरक्षाबलों ने हाल ही में छापेमारी के दौरान हथियारों और गोला-बारूद के साथ कुछ इंटरनेट उपकरण जब्त किए हैं। बताया गया है कि यह छापेमारी 13 दिसंबर को की गई थी। भारतीय सेना के स्पियर कोर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर जब्त की गई इन चीजों की तस्वीरें भी साझा कीं। मणिपुर में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच झड़प के चलते यहां सुरक्षाबलों की तरफ से हथियारों की बरामदगी आम बात है। हालांकि, जिन चीजों की तस्वीरें सामने आई हैं, उनमें एक उपकरण पर ‘स्टारलिंक' का लोगो मौजूद था। गौरतलब है कि स्टारलिंक दुनिया के सबसे अमीर शख्स एलन मस्क की कंपनी है। इस बरामदगी के बाद भारत की सुरक्षा एजेंसियों ने इस तकनीक के भारत में इस्तेमाल को लेकर जांच शुरू कर दी है।
चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में स्टारलिंक के डिवाइस की बरामदगी एक महीने के अंदर ही दूसरी बार हुई है। इससे पहले अंडमान-निकोबार पुलिस ने नवंबर के अंत में एक म्यांमार की एक मछली पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाली नाव से 36,000 करोड़ कीमत के 6000 किलो नशीले पदार्थ और स्टारलिंक का एक डिवाइस जब्त किया था। ये स्टारलिंक का एक माइक्रो इंटरनेट डिवाइस था।
मणिपुर में स्टारलिंक डिवाइस मिलने के बाद कई सवाल खड़े हुए है। इनमें सबसे प्रमुख सवाल यही है कि आखिर स्टारलिंक की यह तकनीक काम कैसे करती है? क्या भारत में इस तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है और यह वैध है? भारत में स्टारलिंक डिवाइस का मिलना चिंता की बात क्यों है और इससे देश की सुरक्षा पर कैसे खतरा हो सकता है? आइये जानते हैं...
स्टारलिंक की तकनीक काम कैसे करती है?
स्टारलिंक एक सेटेलाइट बेस्ड इंटरनेट सर्विस है, जिसे SpaceX द्वारा बनाया गया है। स्टारलिंक, हजारों छोटे सेटेलाइट की मदद से हाई स्पीड इंटरनेट सर्विस प्रोवाइड करता है। स्टारलिंक इंटरनेट सर्विस देने के लिए लो अर्थ आर्बिट सैटेलाइट का इस्तेमाल करती है। एलन मस्क पूरी दुनिया में स्टारलिंक की सेवा पहुंचाने के लिए पृथ्वी की निचली कक्षा में ही 42 हजार सैटेलाइट स्थापित करना चाहते हैं, ताकि कनेक्टविटी और स्पीड बढ़ जाए।
धरती से तकरीबन 500 किलोमीटर की ऊंचाई पर मौजूद रहने वाला एक सेटेलाइट 90 मिनट में पूरी पृथ्वी का चक्कर लगा लेता है। ऐसे में 2200 सेटेलाइट इंटरनेट देने के लिए न सिर्फ हाई स्पीड बल्कि धरती के प्रत्येक कोने में इसकी सुविधा देने में सक्षम हैं। स्टारलिंक को साल 2019 में शुरू किया गया था और अब यह दुनियाभर के 56 से ज्यादा देशों में सैटेलाइट इंटरनेट एक्सेस कवरेज प्रदान करती है।
स्टारलिंक की सबसे खास बात यह है कि इसके सैटेलाइट जमीन पर मौजूद न होकर सीधा आसमान से ही सिग्नल मुहैया कराते हैं। इसे ऐसे समझें कि जहां इंटरनेट मुहैया कराने वाली आम कंपनियां जहां मोबाइल-लैपटॉप और अन्य डिवाइस में सिग्नल मुहैया कराने के लिए केबल या टावर पर निर्भर होती हैं, वहीं स्टारलिंक की व्यवस्था को जमीन पर स्थायी स्टेशनों की उतनी जरूरत नहीं है। यानी स्टारलिंक सैटेलाइट उन जगहों पर भी सिग्नल भेजकर इंटरनेट मुहैया करा सकती हैं, जहां नेटवर्क नहीं आता या जहां जमीन से इंटरनेट सेवा पहुंचाने में बाधाएं आती हैं।
मणिपुर में स्टारलिंक से जुड़ा ताजा घटनाक्रम क्या, कौन से डिवाइस बरामद हुए?
मणिपुर में असम राइफल्स और पुलिस की एक टीम ने चुराचांदपुर, चंदेल, इंफाल पूर्व, कांगपोकपी और घाटी के इलाके में संयुक्त अभियान चलाया। इंफाल पूर्व में सुरक्षाबल की टीम को मैतेई विद्रोहियों के पास से हथियारों के अलावा स्टारलिंक लिखा डिवाइस मिला। बताया गया है कि यह डिवाइस इंटरनेट सैटेलाइट एंटीना और इंटरनेट सैटेलाइट राऊटर हैं। एंटीना का आकार 12*19 के वर्गाकार जैसा है और राउटर पारंपरिक आकार में है और इसमें स्टारलिंक का लोगो लगा है। गौरतलब है कि स्टारलिंक ने नवंबर 2021 में अपने गोल डिश एंटीना को हटाकर इस एंटीना को पेश किया था। इतना ही नहीं राउटर पर लगा स्टारलिंक का लोगो भी ओरिजनल से मिलता है।
साथ ही इसमें आरपीएफ/पीएलए लिखा है, जो कि मैतेई विद्रोही संगठन रेवोल्यूशनरी पीपुल्स फ्रंट (आरपीएफ) और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) के नाम को दर्शाता है। इस संगठन को गृह मंत्रालय की तरफ से प्रतिबंधित किया गया है।
क्या भारत में इस तकनीक का इस्तेमाल हो सकता है और यह वैध है?
भारत में स्टारलिंक की सेवा अभी मौजूद नहीं है। कंपनी ने भारत में सैटेलाइट ब्रॉडबैंड लाइसेंस हासिल करने के लिए आवेदन डाला है। उसे अब नियामकों की मंजूरी मिलने का इंतजार है। बताया गया है कि स्टारलिंक की एप्लिकेशन फिलहाल गृह मंत्रालय के पास लंबित है, जो कि इसके सुरक्षा मानकों को परख रहा है। यानी आधिकारिक तौर पर फिलहाल स्टारलिंक की सेवाएं भारत में उपलब्ध नहीं हैं।
इससे पहले केंद्रीय दूरसंचार मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कहा था कि सैटेलाइट ब्रॉडबैंड सेवाओं के लिए लाइसेंस स्टारलिंक समेत किसी को भी दिया जा सकता है, बशर्ते वे सभी सुरक्षा मापदंडों को पूरा करते हों। सिंधिया ने कहा था कि भारत में सेवाओं के लिए लाइसेंस हासिल करने के लिए सभी मानदंडों का पालन करना होगा। सैटेलाइट इंटरनेट सेवा प्रदाता सभी आवश्यकताओं को पूरा करने की प्रक्रिया में है। ट्राई की तरफ से इस बारे में चर्चा और प्रस्ताव दिए जाने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद उन्हें लाइसेंस मिल सकता है।
हालांकि, मणिपुर में स्टारलिंक का डिवाइस मिलने के बाद खुद एलन मस्क ने इन खबरों पर प्रतिक्रिया दी है। एक पोस्ट में मणिपुर से स्टारलिंक डिवाइस के इस्तेमाल के दावे पर मस्क ने कहा, "यह गलत है। स्टारलिंक सैटेलाइट बीम्स को भारत के ऊपर बंद रखा गया है। यानी भारत में स्टारलिंक का सिग्नल नहीं पहुंच सकता।
भारत के पड़ोसी देशों में क्या है स्टारलिंक की सेवा का हाल
स्टारलिंक की वेबसाइट पर इसके नेटवर्क की मौजूदगी के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है, उसमें उन क्षेत्रों को दर्शाया गया है, जहां कंपनी की सेवाएं मौजूद हैं। भारत में नेटवर्क की मौजूदगी पर स्टारलिंक का कहना है कि वह नियामकों की मंजूरी का इंतजार (Pending Regulatory Approval) कर रहा है। इसी तरह पाकिस्तान के लिए भी स्टारलिंक का यही संदेश है। इससके अलावा बांग्लादेश और भूटान के लिए स्टारलिंक का संदेश '2025 में शुरुआत' दिखाता है। नेपाल और म्यांमार के लिए स्टारलिंक 'सेवा उपलब्ध नहीं' का संदेश दिखाता है।
फिर भारत के लिए क्यों चिंता की बात है स्टारलिंक डिवाइस का मिलना?
I). पड़ोसी देश में हो रहा धड़ल्ले से इस्तेमाल
गौरतलब है कि स्टारलिंक का नेटवर्क फिलहाल आधिकारिक तौर पर भारत के किसी पड़ोसी देश में नहीं है। हालांकि, सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि भारत में अब तक एक महीने के अंदर स्टारलिंक के जो डिवाइस मिले हैं, वह म्यांमार से तस्करी कर लाए गए थे। अब सवाल यह है कि अगर म्यांमार में स्टारलिंक की सेवाएं मौजूद नहीं हैं, तो वहां कंपनी के डिवाइस का क्या उपयोग? तो इसका जवाब है कि म्यांमार में कई उग्रवादी संगठन स्टारलिंक के नेटवर्क का इस्तेमाल काफी समय से कर रहे हैं। म्यांमार के डिजिटल क्षेत्र की निगरानी करने वाले संस्थान म्यांमार इंटरनल प्रोजेक्ट के मुताबिक, इस वक्त वहां स्टारलिंक के 3000 से ज्यादा कनेक्शन मौजूद हैं। स्टारलिंक के डिवाइस का इस्तेमाल न सिर्फ जातीय हिंसा में शामिल विद्रोही संगठन कर रहे हैं, बल्कि सैन्य सरकार के खिलाफ लड़ाई में जुटी आम जनता भी इसे इस्तेमाल करने में जुटी है।
II). विद्रोही संगठन के संपर्क बढ़ा सकते हैं सुरक्षा पर खतरा
मणिपुर के मैतेई विद्रोही संगठनों के सीमापार म्यांमार में भी बड़े संपर्क हैं। खासकर पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) भारत-म्यांमार की सीमा पर काफी सक्रिय है। इस संगठन के कुछ बेस म्यांमार में भी मौजूद हैं। ऐसे में इन डिवाइस के भारत लाए जाने और इनके गलत इस्तेमाल का खतरा बढ़ा सकते हैं।
रिपोर्ट्स के मुताबिक, अधिकारियों ने चिंता जताई है कि मणिपुर में हिंसा रोकने और इन विद्रोही संगठनों के संपर्क काटने के लिए सरकार की तरफ से इंटरनेट बंद करने का हथियार इन स्टारलिंक डिवाइस की वजह से बेकार साबित हो सकता है। ये स्टारलिंक डिवाइस सैटेलाइट के जरिए ही इंटरनेट सेवा पा सकते हैं और चूंकि यह पारंपरिक टावर और मोबाइल के सेवा प्रदाताओं पर निर्भर नहीं होंगे, इसलिए इन पर इंटरनेट प्रतिबंध का भी कोई असर नहीं होगा। ऐसे में चरमपंथी और विद्रोही संगठन धड़ल्ले से इंटरनेट सेवाओं का इस्तेमाल कर सकते हैं।
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