श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंघे ने उम्मीद जताई है कि कर्ज पाने के सवाल पर इस महीने के आखिर तक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के साथ उनकी सरकार की सहमति बन जाएगी। उन्होंने उम्मीद जताई है कि सितंबर में आईएमएफ का कार्यकारी बोर्ड कर्ज देने के फैसले पर अपनी मुहर लगा देगा। सरकारी अधिकारियों की एक बैठक में विक्रमसिंघे ने कहा कि अभी आईएमएफ में छुट्टी चल रही है। इसलिए कर्ज संबंधी फैसला अगस्त के आखिर तक जाकर ही हो पाएगा।
विश्लेषकों की राय है कि आईएमएफ का ये फैसला काफी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि तब तक श्रीलंका में कैसे हालात बनते हैं। राष्ट्रपति विक्रमसिंघे भी इस हकीकत से वाकिफ हैं। उन्होंने अमेरिकी अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू में कहा है कि अगर श्रीलंका में राजनीतिक स्थिरता बनी, तो उससे देश को लाभ होगा। इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा कि मेरी राय में हम पहले ही सबसे निचले स्तर तक जा चुके हैं। अब यहां से हमें उम्मीद की किरण नजर आ रही है। लेकिन श्रीलंका में आर्थिक स्थिति सुधरने में अभी कई महीने लगेंगे।
विक्रमसिंघे सरकार लगातार यह संकेत दे रही है कि आईएमएफ श्रीलंका को कर्ज देने के लिए मोटे तौर पर सहमत हो गया है, लेकिन समझौते की बारीकियां अभी तय होनी हैं। विक्रमसिंघे ने द वॉल स्ट्रीट जर्नल से कहा कि सरकार विरोधी समूहों का प्रदर्शन जारी रहने के कारण कर्ज मिलने में देर हुई है। अगर कर्ज के लिए समझौता नहीं होता है, तो फिर हमारे पास कोई रकम नहीं होगी।
जानकारों के मुताबिक अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कर्ज संबंधी निर्णय लेने की कोई संभावित तारीख श्रीलंका सरकार को नहीं बताई है। खुद देश के वित्त मंत्रालय ने ने कहा है कि श्रीलंका के कर्ज संबंधी सलाहकार अभी स्थिति का जायजा ले रहे हैं। वे इस संभावना को तलाश रहे हैं कि श्रीलंका को किन-किन स्रोतों से कितना कर्ज मिल सकता है। उनके आकलन के आधार पर संभावित कर्जदाताओं से बातचीत शुरू की जाएगी।
श्रीलंका सरकार लगातार अपनी मुद्रा रुपये की छपाई कर रही है। उससे वह देश के अंदर काम चला रही है, लेकिन उस वजह से विदेशी विनिमय के जटिलताएं खड़ी हुई हैं। आलोचकों के मुताबिक सरकार के इस रुख से भी विदेशी मुद्रा की कमी लगातार गंभीर होती गई है।
पर्यवेक्षकों के मुताबिक राष्ट्रपति विक्रमसिंघे की वैधता को लेकर जारी अनिश्चय भी श्रीलंका के लिए समस्या बनी हुई है। द वॉल स्ट्रीट जर्नल ने इस बारे में भी उनसे सवाल पूछा। इस पर विक्रमसिंघे ने अपने निर्वाचन का बचाव किया। उन्होंने कहा कि मैं संयोगवश राष्ट्रपति बना, क्योंकि राष्ट्रपति ने इस्तीफा दे दिया था। उस समय देश में आग लगी हुई थी। लोगों ने इमारतों पर कब्जा कर रखा था। मेरा निर्वाचन संवैधानिक ढंग से हुआ है। अब यह हमारी जिम्मेदारी है कि हम बेहतर प्रदर्शन करें।
लेकिन आम राय यह है कि विक्रमसिंघे के निर्वाचन को लेकर सरकार विरोधी की तरफ से उठाए जा रहे सवालों ने श्रीलंका की राजनीतिक स्थिरता को लेकर संदेह कायम रखा है। इसका असर आईएमएफ से बातचीत पर पड़ सकता है।