अपने वित्तमंत्री अरुण जेटली (राम) वनवास (स्वास्थ्य लाभ का अवकाश) खत्म करके काम पर लौट रहे हैं। किडनी ट्रांसप्लांट के बाद स्वास्थ्य लाभ ले रहे जेटली जी अभी मीडिया में ही सक्रिय थे। वह घर पर स्वास्थ्य लाभ ले रहे थे और मंत्रालय की कमान भरत यानी केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल पर थी। संसद का मानसून सत्र शुरू होने के बाद से जेटली जी काम पर लौटना चाह रहे थे, लेकिन स्वास्थ्य, संक्रमण संबंधी जटिलताओं, चिंताओं को देखते हुए सरकार की तरफ से उन्हें घर पर रहने की सलाह मिलती रही।
जेटली जी की अनुपस्थिति में केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने अविश्वास प्रस्ताव के दौरान मोर्चा संभाल लिया था। जेटली के पार्टी के भीतर मौजूद समर्थक भी इस स्थिति से काफी परेशान थे। उनकी परेशानी का इस बार कारण कार्यवाहक वित्तमंत्री पीयूष गोयल थे। पीयूष गोयल धड़ाधड़ एक के बाद एक निर्णय ले रहे थे और समर्थकों को लग रहा था कि कहीं इससे जेटली की ताकत कमजोर न हो जाए। लेकिन जेटली की व्यग्रता को देखते हुए उनकी अयोध्या वापसी को हरी झंडी मिल गई है। 15 अगस्त से पहले वह वित्त मंत्रालय में अपना पदभार संभाल सकते हैं।
क्या 2019 के लिए महागठबंधन होगा? विपक्षी दलों के संभावित सभी नेता कहते हैं कि जरूर होगा। इसकी घोषणा भी जल्द ही हो जाएगी। ताकि एकजुटता के राजनीतिक अभियान को तेज किया जा सके। लेकिन खबर है बसपा प्रमुख अभी तोल रही हैं। भाजपा चाह रही है बसपा कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन न करें। इसलिए बसपा चाह रही है कि वह इस अवसर का भरपूर लाभ ले ले।
मायावती यह मनौव्वल इसलिए भी करा रही हैं, क्योंकि उनकी पार्टी से गठबंधन होने पर सबसे ज्यादा वोट ट्रांसफर होता है। भाजपा भी इसी को लेकर गठबंधन के नाम से परेशान है। वह हार्ड बारर्गेनर बनी हुई हैं। यही स्थिति ममता की भी है। ममता मानकर चल रही हैं कि पश्चिम बंगाल की करीब-करीब 98 प्रतिशत लोकसभा सीटें तृणमूल कांग्रेस के खाते में आने वाली हैं। इसलिए राजनीतिक तालमेल तो होगा, लेकिन पश्चिम बंगाल में वह तृणमूल को तृणमूल बनाए रखेंगी।
टीवी चैनल वाले टीआरपी के लिए कुछ भी कर सकते हैं। ऐसा ही एक मामला लोकसभा की दर्शक दीर्घा में हुआ। देश के कुछ समय ही पुराने लेकिन टीआरपी में ठीक चल रहे टीवी चैनल रिपब्लिक को कुछ भाजपा नेताओं का आशीर्वाद प्राप्त है। लिहाजा अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान कुछ रिपब्लिकन प्रोफेशनल्स सांसदों के सिफारिशी पास पर दर्शक दीर्घा तक पहुंच गए।
पहुंच तो गए लेकिन लोकसभा टीम की मॉनिटरिंग से नहीं बच सके। फिर तो जो हुआ, वह भी एक कहानी ही है। थोड़ी देर में सुरक्षा बलों ने सभी पत्रकार भाइयों को अपने कब्जे में ले लिया। बताते हैं पूछताछ का दौर शुरू हो गया। इधर टीवी चैनल के धुरंधरों की परेशानी बढ़ गई। लेकिन चूंकि मामला हाई प्रोफाइल था। इसलिए देर रात तक बैठक, पंचायत करके इसे सुलझा लिया गया। रिपब्लिक को अपने किए पर खेद प्रकट करना पड़ा। अब कौन कहे कि भाई टीआरपी के लिए क्या कुतुब मीनार से भी कूद जाओगे।
जब से प्रधानमंत्री ने लखनऊ में मंच से दर्शक दीर्घा में बैठे अमर सिंह का नाम लिया है, अमर बाबू का रक्तचाप बढ़ाने लगा है। इस समय वह जहां भी जा रहे हैं प्रधानमंत्री मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की खूब तारीफ कर रहे हैं। वहीं कांग्रेस पार्टी के बड़े-बड़े धुरंधरों पर उद्योगपतियों से संबंध की खूब धूल उड़ा रहे हैं।
मजे की बात यह भी अमर सिंह यह सब कहते हुए खुद को बहुत छोटा आदमी बताते हैं। बताते हुए यह भी कहना नहीं भूलते कि मोदी जी के सामने उनकी क्या औकात। यह तो प्रधानमंत्री का बड़प्पन है कि उन्होंने अमर सिंह जैसे नाचीज को याद किया। इसके साथ-साथ अमर सिंह अखिलेश यादव को अपने अंदाज में कोसना नहीं भूलते। वहीं अखिलेश जो कभी अमर सिंह के भतीजे हुआ करते थे। तब अमर सिंह खुद को मुलायम सिंह यादव का दर्जी बताते थे। सिंह का कहना था कि मुलायम सिंह उन्हें जैसी डिजाइन बताते हैं, वह उसी तरह परिधान तैयार कर देते हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सुशासन बाबू वाली छवि एक बार फिर दांव पर लगने वाली है। भाजपा से गठबंधन करने के बाद सृजन घोटाले ने उनकी नींद हराम की थी। इस घोटाले के तार सीधे भाजपा नेताओं से जुड़े हैं। किसी तरह नीतीश कुमार ने अपनी जान बचाई। इसके बाद यहां, वहां अल्पसंख्यकों पर हमले की खबर आई। भाजपा के एक केंद्रीय मंत्री तो नीतीश के लिए इस कदर परेशानी का सबब बन गए कि मंत्री जी की शिकायत उन्हें प्रधानमंत्री तक से करनी पड़ी। लेकिन अब एक ब्रजेश ठाकुर पकड़ा गया है।
मुजफ्फरपुर से छपने वाले अखबार का ऊंची रसूख वाला मालिक। सेल्टर होम के नाम पर लड़कियों के साथ दरिंदगी का मुख्य आरोपी है। ब्रजेश ठाकुर से जुड़ा हर प्रकरण अब न तो नीतीश कुमार से उगला जा रहा है और न ही निगला। खबर तो यह भी है कि उसने भाजपा और जद(यू) के बड़े बड़े नेताओं को सेवाएं दी हैं। वहीं लालू प्रसाद के दोनों बेटों ने धमाल मचाया हुआ है। तेजस्वी जहां राज्य सरकार पर हमले बोल रहे हैं, वहीं तेजप्रताप भोला भंडारी (कांवडिया) बनकर बिहार के लोगों का ध्यान खींच रहाे हैं।
भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश, बिहार की चिंता खाए जा रही है। प्रधानमंत्री की चिंता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वह पिछले डेढ़ महीने के भीतर पांच से अधिक बार उत्तर प्रदेश का दौरा कर चुके हैं। यही स्थिति भाजपा अध्यक्ष की भी है। हालत तो यह है कि शीर्ष नेता 2019 के आम चुनाव की चुनौती देखते हुए 80 सीटों वाले उत्तर प्रदेश में जाने का बहाना खोज रहे हैं। वहीं राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ एक्शन में हैं। मुख्यमंत्री राजनीतिक कॉकटेल का अद्भुत समीकरण बनाते नजर आ रहे हैं।
राजनीतिक चुनावी खर्चे को लेकर भी योगी का नजरिया साफ है। उन्होंने पल्ला ही झाड़ लिया है। वह कहते हैं कि साधू संन्यासी से पैसे का क्या काम। वहीं भाजपा उत्तर प्रदेश में हर लोकसभा सीट पर सोशल मीडिया टीम से लेकर हर दांव अाजमाना चाह रही है। बताते हैं पार्टी कहीं न कहीं महसूस कर रही है कि राज्य में उसकी सीटें काफी घट सकती हैं। ऐसा होने के लिए काफी हद तक योगी सरकार का कामकाज भी जिम्मेदार है लेकिन योगी जी हैं कि अपने पूरे रंग में हैं। हों भी क्यों न। अब तो उत्तर प्रदेश का विधानसभा चुनाव 2022 में होगा। तब तक के लिए वह राज्य साधना कर रहे हैं।