जज शर्मा ने आगे कहा, पूरी जांच एक खास लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक स्क्रिप्ट पर केंद्रित थी। इस प्रक्रिया के तहत राजनीतिक नेताओं को फंसाने की धुन में सीबीआई ने आरोप पत्र में सबूत गढ़े और गवाहों के बयान शामिल किए। उन्होंने कहा, ये बयान अदालत की न्यायिक समीक्षा का सामना नहीं कर पाए और गवाहों ने अदालत के सामने निडरता से इशारा किया कि राजनीतिक नेताओं को फंसाने के मकसद से सीबीआई ने अपनी स्क्रिप्ट सही ठहराने के लिए उनके बयान गलत दर्ज किए।
क्या है सोहराबुद्दीन मामला
गुजरात के गैंगस्टर सोहराबुद्दीन, उसकी पत्नी कौसर बी और सहयोगी तुलसी प्रजापति को एक पुलिस टीम ने 22-23 नवंबर, 2005 को हैदराबाद से महाराष्ट्र के सांगली जाने के लिए बस में सवार होने पर हिरासत में ले लिया था। पति-पत्नी को प्रजापति से अलग वाहन में रखा गया था। बाद में 26 नवंबर, 2005 को सोहराबुद्दीन की एनकाउंटर में मौत हो गई थी, जबकि उसके तीन दिन बाद कौसर बी का भी शव मिला था।
प्रजापति भी एक साल बाद 27 दिसंबर, 2006 को उदयपुर जेल से लाते समय गुजरात-राजस्थान सीमा पर एनकाउंटर में मारा गया था। सीबीआई ने इस मामले में गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह, राजस्थान के तत्कालीन गृह मंत्री गुलाबचंद कटारिया, डीजी वंजारा व पीसी पांडे समेत कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों समेत कुल 38 लोगों को आरोपी बनाया था। सीबीआई ने 210 गवाह पेश किए थे, जिनमें से 92 बाद में बयान से पलट गए थे।