गाय का ऐसा सेक्स वीर्य तैयार करवा रही है मोदी सरकार जिससे बछिया ही जन्म लेंगी
बीफ और पशुवध को लेकर चल रहे सियासी संग्राम के बीच भगवा परिवार पशु मांस के कारोबार पर स्थाई रूप से नकेल लगाने की कवायद में जुटा हुआ है। संघ के इशारे पर केंद्र सरकार के कषि मंत्रालय ने पशु वैज्ञानिकों को ऐसी तकनीक विकसित करने के काम में जुटा रखा है जिससे सिर्फ बछियां ही जनमें बछडे नहीं। हरियाणा के करनाल में स्थित नेशनल डेयरी रिसर्च इंस्टीटयूट में वैज्ञानिकों का एक समूह एक ऐसी देशी तकनीक इजात करने में जुटा है जिससे की सिर्फ बछियां ही पैदा हो। जिससे की न सिर्फ देश में दूध उत्पादन बढेगा बल्कि आर्थिक रूप से बोछील बन चुके बैल और सांडों को मारने की समस्या से बचा जा सके।
बुचड़खानों के पक्ष में यह दलील दी जाती है कि यदि बैल और बछडों को काटा नहीं जाएगा तो इनकी संख्या बढ जाएगी और असंतुलन बढेगा।मगर केंद्र में भाजपा की सरकार आने के बाद कषि मंत्रालय इस कार्य में तेजी से जुटा है।कषि राज्य मंत्री संजीव बालियान का कहना है कि एनडीआरआई, करनाल को उन्होंने सेक्स तकनीक को विकसित करने के अभियान में जुटाया है। इस कार्य में लगे वैज्ञानिकों का भी कहना है कि शोध अभी शुरूआती दौर में है। इसे सेक्स—सीमेन तकनीक कहा जाता है। इसके तहत गाय के अंदर सांड का वीर्य निसेचीत करने से पहले सांड के वीर्य से वाई क्रोमोजोम को पूरी तरह से अलग कर दिया जाता है। जिसके वजह से सिर्फ बछियों का ही जन्म होगा, बछडे पैदा नहीं होंगे। किसी भी नर का जन्म तभी हेाता है जब एक्स और वाई क्त्रसेमोसोम एक साथ मिलते हैं। वैसे तो यह शोध वर्ष 2000 से शुरू है। मगर इसके कार्य में रफतार वर्ष 2014 में केंद्र में भाजपा की सरकार बनने के बाद पकड़ी है। अभी 25 से 30 वैज्ञानिकों का एक दल तत्परता से शोध में जुटा हुआ है। कषि मंत्री बालियान ने इस परियोजना की समय सीमा वर्ष 2017 निर्धारित कर रखी है। इसलिए भ्री वैज्ञानिकों पर दबाव है।
सेक्स—सीमेन की वर्तमान तकनीक को फले साईटोमेट्री भी कहा जाता है। अमेरिकी कंपनी नपे इस तकनीक का पेटेंट कराया हुआ है। मगर भारतीय वैज्ञानिक ऐसी देशी तकनीक के इजात में जुटे हुए हैें जिसमें अपने देशी तरीके से सांड के वीर्य से सभी वाई क्त्रसेमोसोम को अलग किया जा सके। यह अमेरिकी तकनीक से बिल्कुल अलग होगा। कार्य में जुटे एक वैज्ञानिक का कहना है कि शोध की प्रक्त्रिस्या बेहद जटील है। पहले ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। मादा के वीर्य से एक्स और वाई क्रोमोजोम को बिल्कुल अलग करना बेहद कठीन ही नहीं बल्कि असंभव कार्य है,बावजूद उसके वैेज्ञानिकों को सफलता मिलने की पूरी उम्मीद है। उक्त वैज्ञानिक के अनुसार शुरूआती शोध सही दिशा में है।
शोध के बारे में बताया जा रहा है कि यह बेहद खर्चिला है। बछडे के वीर्य का एक डोज उन्हेें 2000 का पडता है। इस महत्वाकांक्षी परियोजना को परवान चढाने के लिए वैानिकों ने वर्ष 2015—16 में सरकार से 55 करोड रूपए मांगे थे। जबकि सरकार ने 2016—17 में जाकर उन्हें महज 6 से 7 करोड रूपए दिए हैं। कार्य में जुटे वैज्ञानिक का कहना है कि सरकार ने इस परियोजना में रूची दिखाई है। इसलिए उन्हें उम्मीद है कि फंड की कमी दूर होगी और इस परियोजना के दिन बहुरेंगे।
बताया जा रहा है कि बछडों की पैदाइस कम होने से भारतीय अर्थव्यवस्था को प्रति वर्ष 20 हजार करोड रूपए की बचत होगी। बैलों के उम्रदराज हो जाने के बाद उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है और उनके लालन—पालन में किसानों का धन जाया जाता है। पहले के जमाने में खेती में बैलों का उपयोग होता था। मगर जब से ट्रेक्टर और मशीन ने खेती में जगह बनाई है। तब से बैलों का उपयोग कम हुआ है। समस्या तबसे और बढ गई है जबसे बुचड़खानों पर प्रतिबंध लगने शुरू हुए हैं। गायों के वध पर देश में पहले से ही प्रतिबंध है। लेकिन बछडे की आड में कई बुचड़खाने अवैध रूप से गाय काटते हैं। जिसे लेकर बेवजह समाज में तनाव भी पैदा हो रहे हैं। मगर इस तकनीक के इजात होने से बछडों की संख्या पर तो लगाम लगेगी ही उनकी आड में हो रहे गौ हत्या पर भी लगाम कसेगी।
Published By Rahul Sankrityayan