सबरीमाला मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी किसी रजस्वला आयु (10 से 50 साल) की महिला को मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। जब से फैसला आया है तभी से इसका विरोध भी किया जा रहा है। अब इसपर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी का भी बयान आया है। उनका कहना है कि उन्हें मंदिर में पूजा करने का अधिकार है अपवित्र करने का नहीं।
सबरीमाला मंदिर के कपाट पूजा के लिए खोले गए थे जो कि सोमवार को बंद हो गए। मंदिर 4 नवंबर तक बंद रहेगा। एक कार्यक्रम के दौरान स्मृति ईरानी ने कहा, 'मैं मौजूदा केंद्रीय मंत्री हूं इसलिए मैं सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर टिप्पणी नहीं कर सकती हूं। लेकिन मुझे लगता है कि मेरे पास पूजा करने का अधिकार है, लेकिन अपवित्र करने का नहीं। और यही वह अंतर है जिसे पहचानने और सम्मान करने की जरूरत है।' उन्होंने आगे कहा, 'क्या आप महावारी के खून से सने सेनेटरी नेपकिन को लेकर अपने दोस्त के घर जाएंगी? आप नहीं जाएंगी। तो फिर भगवान के घर क्यों जाना चाहती हैं? यही वह अंतर है।' हालांकि ईरानी ने साफ कहा कि यह उनकी व्यक्तिगत राय है।
मंदिर में महिलाओं के प्रवेश न करने के पीछे महावारी भी है वजह
अक्सर हम अपने रोजमर्रा के जीवन में देखते हैं कि चाहे लोग कितने भी पढ़े लिखे क्यों न हों। उनके मन में एक धारणा जरूर होती है कि महावारी के समय महिलाओं को मंदिर में प्रवेश नहीं करना चाहिए। कई जगह तो बंदिशें और भी अधिक होती हैं। जैसे अचार न छूना, जमीन पर सोना आदि। लेकिन जब महावारी नहीं होती तो महिलाएं मंदिर में दर्शन भी कर सकती हैं और पूजा भी। वहीं अगर सबरीमाला मंदिर की बात करें तो यहां रजस्वला आयु की महिलाओं को कभी भी प्रवेश नहीं करने दिया जाता।
कहा जाता है कि भगवान अयप्पा ने यह खुद तय किया था कि कौन उनके दर्शन कर सकता है और कौन नहीं। बता दें भगवान के मंदिर में लाखों पुरुष पहाड़ चढ़कर नंगे पैर जाते हैं। वे 41 दिनों का व्रत भी रखते हैं। जिस दौरान वह शराब, धूम्रपान, नॉन वेज, संबंध बनाना और उन महिलाओं से दूर रहते हैं जिन्हें महावारी होती है। इसके बाद ही वह दर्शन के लिए निकलते हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भी किसी महिला को मंदिर में प्रवेश नहीं मिला है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिकाएं दाखिल की गई हैं। इस पर मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 13 नवंबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई होगी।