एक नए अध्ययन में प्राकृतिक बाढ़ के मैदानों के मानवजनित विनाश का पहला वैश्विक अनुमान लगाया है। अध्ययन में कहा गया है कि यह भविष्य के विकास को सही मार्गदर्शन करने में मदद कर सकता है। यह अध्ययन आर्लिंगटन विश्वविद्यालय के जल विज्ञानी, अदनान राजीव की अगुवाई में शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है।
1992 से 2019 के बीच 27 वर्षों में दुनिया भर में बुनियादी ढांचे के विस्तार के चलते 6 लाख वर्ग किलोमीटर बाढ़ के मैदान गायब हो गए हैं। मानव निर्मित अवरोध, तटबंधों, नहरों और विकासात्मक गतिविधियों से संबंधित बेतरतीब निर्माण से नदियों के जल प्रवाह की क्षमता में कमी आ रही है। अंधाधुंध शहरीकरण के कारण जल निकास की उचित व्यवस्था न कर पाने के कारण लोगों को विनाशकारी बाढ़ का सामना करना पड़ रहा है।
विज्ञापन
एक नए अध्ययन में प्राकृतिक बाढ़ के मैदानों के मानवजनित विनाश का पहला वैश्विक अनुमान लगाया है। अध्ययन में कहा गया है कि यह भविष्य के विकास को सही मार्गदर्शन करने में मदद कर सकता है। यह अध्ययन आर्लिंगटन विश्वविद्यालय के जल विज्ञानी, अदनान राजीव की अगुवाई में शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है तथा नेचर साइंटिफिक डेटा नामक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। शोधकर्ताओं का कहना है कि हमने जितना सोचा था दुनिया में उससे कहीं अधिक बाढ़ का खतरा है। टीम ने दुनिया के 520 प्रमुख नदी घाटियों का अध्ययन करने के लिए उपग्रह आधारित रिमोट सेंसिंग आंकड़ों और भू-स्थानिक विश्लेषण का उपयोग किया। विश्लेषण के दौरान पहले अज्ञात स्थानीय पैटर्न और बाढ़ के मैदान में मानवजनित बदलाव के रुझानों की खोज की गई।
भारत में 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि बाढ़ प्रभावित
राष्ट्रीय बाढ़ आयोग ने देश में 4 करोड़ हेक्टेयर भूमि को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र घोषित किया है। असम, पश्चिम बंगाल और बिहार राज्य सबसे अधिक बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में से हैं। इसके अतिरिक्त उत्तर भारत की ज्यादातर नदियां, विशेषकर उत्तर प्रदेश में बाढ़ लाती रहती हैं। राजस्थान, गुजरात, हरियाणा और पंजाब आकस्मिक बाढ़ के कारण पिछले कुछ दशकों में जलमग्न होते रहे हैं।
विज्ञापन
उद्देश्य
अध्ययनकर्ता के मुताबिक बदलती जलवायु में बाढ़ के खतरों को कम करने के लिए भविष्य के विकास को निर्देशित करने में यह अध्ययन महत्वपूर्ण हो सकता है। कुछ मामलों में हमें उम्मीद है कि यह अध्ययन हमें पिछले विकास निर्णयों के दौरान की गई गलतियों को सुधारने में मदद कर सकता है।