भारत और चीन के बीच सीमा विवाद तो पुराना है, लेकिन चुनिंदा ही मौके हैं जब दोनों देशों के बीच सैन्य आमना-सामना हुआ है। दो ऐसे खास पड़ाव आए हैं, जब आमने-सामने फौज को काफी संख्या में जमा किया गया था। एक तो 1967 में हुआ था। तब मकसद यही था कि सीमा विवाद को लेकर जो दावे थे, उनको पुख्ता करने के लिए। उस समय तो असल हिंसा हुई और उसमें काफी जानें भी गईं।
अगला सबसे गंभीर वाकया 1986 में हुआ था, ये सुमदोरोंग चू की घटना है। ये आखिरी मौका था, जब इतनी बड़ी तादाद में करीब दो लाख भारतीय सैनिकों को वहां तैनात किया गया था। चीन की तरफ से भी टुकडियां आई थीं और आमना-सामना हुआ था। उस वक्त हिंसा तो नहीं हुई थी, लेकिन एक डर था कि कब युद्ध छिड़ जाएगा।
ये दो अहम मौके हैं। उसके बाद तो सीमा उल्लंघन की घटनाएं हैं, जो दोनों तरफ से होते हैं, क्योंकि वह निर्धारित नहीं है। दोनों देशों के लिए बड़ी उपलब्धि है कि दोनों देशों की सेनाओं के बीच 30 साल से हिंसा नहीं हुई, गोली नहीं चली है।
विवाद जारी रहा है, उसका समाधान खोजने की कोशिशें भी हुई हैं। लेकिन सीमा शांत रही है। उसके बाद हाल ही में जब ली कछियांग 2013 में और शी जिनपिंग 2014 में भारत यात्रा पर आए थे, उस समय चीनी सैनिकों ने पड़ाव डाला हुआ था, वो भी कुछ दिनों तक चला। हालांकि बाद में बातचीत से रिस्टोर कर लिया गया है।
बातचीत होती रहे तो बेहतर है
भारत और चीन के बीच लगभग एक महीने से तनाव जारी है। इस स्थिति में हैम्बर्ग में प्रधानमंत्री मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की बातचीत हो तो अच्छा है। वैसे चीन अपना आधिकारिक रुख जाहिर कर चुका है। अगर इसमें कोई बदलाव करना है तो वो एक अलग प्रकिया चलेगी लेकिन चीन कह चुका है कि वो अपना मौजूदा रुख नहीं बदलेगा। चीन ने इस स्थिति में भारत के साथ हैम्बर्ग में बातचीत के लिए मना किया है।
चीनी राष्ट्रपति जिंगपिंग भारत आ चुके हैं, मोदी जी के साथ अहमदाबाद में झूला भी झूल चुके हैं लेकिन लोग अब कहने लगे हैं कि चीन भारत को ही झूला झुला रहा है। उसके बाद पाकिस्तान, अजहर मसूद और एनएसजी के मुद्दे पर भारत और चीन के बीच कड़वाहट आ चुकी है। भारत ने दलाई लामा को अरुणाचल प्रदेश जाने दिया, अमरीकी राजदूत को भी वहां जाने दिया। दलाई लामा जिस तरह से बयान देते रहे हैं, उससे भी चीन को आशंका होती है कि भारत के इरादे सही नहीं है। शक दोनों तरफ से पैदा हुए हैं।
भारतीय कूटनीति कहां विफल हो जाती है
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ये सरकारों का काम है कि किस तरह से कूटनीति का इस्तेमाल करके तनाव कम करे और संबंधों को बेहतर बनाए। दूसरी तरफ जनमत का सवाल है जिस पर सरकार को सोचना पड़ता है। भारत और चीन दोनों तरफ जनमत ये है कि हम अपने हितों को किसी कीमत पर नहीं छोड़ेंगे।
ऐसे में जनमत, कूटनीति पर कभी कभी हावी हो जाता है। शी जिनपिंग को अपनी मजबूत नेता की छवि कायम रखनी है और मोदी के सामने भी यही चुनौती है। ऐसी हालत में कूटनीति की राह थोड़ी संकुचित हो जाती है।