सटीक रिर्पोटिंग कठिन
एक अन्य अधिकारी का कहना है कि स्वास्थ्य विभाग में अभी भी डाटा मैनुअली दर्ज किया जाता है। गर्मी से संबंधित मौतों की पुष्टि करना पहले ही काफी जटिल है। ऐसे में मैनुअल डाटा प्रविष्टि से सटीक रिपोर्टिंग और भी कठिन हो जाती है। हालांकि एकीकृत स्वास्थ्य सूचना प्लेटफॉर्म (IHIP) गर्मी से संबंधित मौतों का डिजिटल दर्ज करता है, लेकिन यह भी अस्पताल के कर्मचारी मैनुअल तौर पर फार्म में भरकर देते हैं। एक वरिष्ठ डॉक्टर का कहना है कि अधिकांश अस्पतालों में स्टाफ की कमी है, जिससे उचित डाटा संग्रह और समय पर रिपोर्टिंग में बाधा आती है। डॉक्टर ने यह भी आरोप लगाया कि अधिकारी मुआवजा देने से बचने के लिए मौत के आंकड़ों को दबा सकते हैं।
मौत की रिपोर्टिंग प्रणाली कमजोर
स्वास्थ्य मंत्रालय की सलाहकार सौम्या स्वामीनाथन कई बार देश की मृत्यु-रिपोर्टिंग प्रणालियों की कमजोर होने की बात कह चुकी हैं। उनका कहना है कि देश में मृत्यु-सूचना प्रणालियों को मजबूत बनाने की आवश्यकता है, क्योंकि वे सरकार और नीति निर्माताओं को मृत्यु के कारणों को समझने के लिए सही स्रोत देते हैं।
अलग विभाग बनाने की वकालत
एनआरडीसी इंडिया में जलवायु लचीलापन एवं स्वास्थ्य प्रमुख अभियंत तिवारी ने कहा कि गर्मी के कारण होने वाली मौतों को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराना न केवल भारत में बल्कि वैश्विक चुनौती बनी हुई है। उन्होंने कहा कि गर्मी से संबंधित कई मौतें दर्ज नहीं की जाती हैं या उन्हें दिल के दौरे या अन्य कारणों के रूप में गलत वर्गीकृत किया जाता है। उन्होंने सभी कारणों से होने वाली मृत्यु के आंकड़ों की रिपोर्टिंग में सुधार की आवश्यकता पर जोर दिया। साथ ही इसके लिए अलग विभाग बनाने की वकालत की।
वहीं ग्रीनपीस दक्षिण एशिया के उप कार्यक्रम निदेशक अविनाश चंचल ने गर्मी से संबंधित मौतों को दर्ज करने के तरीके में तत्काल सुधार की मांग की है। उन्होंने कहा कि विभागों के बीच विसंगतियां और व्यापक रूप से कम रिपोर्टिंग का मतलब है कि अत्यधिक गर्मी से होने वाली वास्तविक क्षति अक्सर छिपी रहती है। जब तक भारत अपनी डाटा प्रणाली को ठीक नहीं कर लेता, तब तक मृतकों की संख्या सिर्फ एक ही रहेगी।