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UCC: समान नागरिक संहिता को लेकर शाहबानो मामले के बाद से शीर्ष अदालत की रही है मौन सहमति, कोई कानूनी अड़चन नहीं

Fri, 16 Jun 2023 06:42 AM IST
देव कश्यप राजीव सिन्हा, नई दिल्ली।

सार

मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण से संबंधित 1985 के चर्चित शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, यह अफसोस की बात है कि सविधान का अनुच्छेद-44 ‘डेड लेटर’ बना हुआ है। तब कोर्ट ने यह भी कहा था कि समान नागरिक संहिता से परस्पर विरोधी विचारधारा वाले कानूनों के प्रति जबरन वफादारी को दूर करके राष्ट्रीय एकता को मदद मिलेगी।
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सुप्रीम कोर्ट। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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देश में समान नागरिक संहिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट की बहुत पहले से ही ‘मौन सहमति’ रही है। शाहबानो मामला (1985) व उसके बाद कई अन्य मामलों में सुप्रीम कोर्ट इसकी जरूरत पर बल दे चुका है। इससे समान नागरिक संहिता लाने में केंद्र सरकार के पास कोई कानूनी अड़चन नहीं है।

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मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण से संबंधित 1985 के चर्चित शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, यह अफसोस की बात है कि सविधान का अनुच्छेद-44 ‘डेड लेटर’ बना हुआ है। तब कोर्ट ने यह भी कहा था कि समान नागरिक संहिता से परस्पर विरोधी विचारधारा वाले कानूनों के प्रति जबरन वफादारी को दूर करके राष्ट्रीय एकता को मदद मिलेगी। अनुच्छेद-44 कहता है कि देश में समान नागरिक संहिता होनी चाहिए।

इसी तरह 1995 के सरला मुद्गल मामले में द्विविवाह और विवाह के मामलों में व्यक्तिगत कानूनों के बीच संघर्ष से संबंधित मुद्दा था। सुप्रीम कोर्ट ने फिर से समान नागरिक संहिता की आवश्यकता बताई थी। तब कोर्ट ने पीएम से अनुच्छेद-44 पर नए सिरे से विचार करने और भारत में नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता के लिए प्रयास करने को कहा था और उठाए गए कदमों से न्यायालय को सूचित करने का अनुरोध किया था। उधर, सितंबर, 2019 में एक फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था, संविधान निर्माताओं ने उम्मीद जताई थी कि अनुच्छेद-44 के मद्देनजर राज्य पूरे देश में समान नागरिक संहिता सुनिश्चित करेगा, लेकिन अब तक इस संबंध में कोई प्रयास नहीं किया गया।
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सीजेआई ने कहा था ऐसे मुद्दे संसद के अधीन : विगत 23 मार्च को सीजेआई जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने समान नागरिक संहिता की मांग की कई याचिकाओं को यह कहते हुए बंद कर दिया कि इस तरह के मुद्दे संसद के निर्णय के अधीन हैं। अदालत विधायिका को कानून बनाने का निर्देश जारी नहीं कर सकती।

संपत्ति का अधिकार, शादी, तलाक पर समान कानून हो : केंद्र
गत वर्ष अक्तूबर में इन याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट को दिए हलफनामे में सरकार ने कहा था कि अलग-अलग लोगों के अलग-अलग कानूनों का पालन करना ‘राष्ट्र की एकता का अपमान’ है। अनुच्छेद-44 का जिक्र करते हुए केंद्र ने कहा था कि यह इस अवधारणा पर आधारित है कि विरासत, संपत्ति का अधिकार, शादी, तलाक, नाबालिग बच्चों की कस्टडी, भरण-पोषण और उत्तराधिकार के मामलों में समान कानून होगा।

विपक्ष ने उठाए सवाल, भाजपा बोली-लागू कराएंगे
लोकसभा चुनाव से पहले समान नागरिक संहिता को लेकर सियासी बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस के महासचिव जयराम रमेश ने कहा कि विधि आयोग को अपनी विरासत का ध्यान रखना चाहिए और यह भी याद रखना चाहिए कि देश के हित भाजपा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं से अलग होते हैं।

  • समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने विधि आयोग की ओर से समान नागरिक संहिता पर नए सिरे से राय मांगने पर कड़ी आपत्ति जताई और कहा कि यह केवल देश में नफरत फैलाएगा।
  • जेडीयू प्रवक्ता केसी त्यागी ने कहा, सभी हितधारकों, समुदायों और विभिन्न धर्म के सदस्यों को विश्वास में लेकर बात करने की जरूरत है।
  • तृणमूल कांग्रेस के प्रवक्ता डेरेक ओब्रायन ने कहा, सरकार नई नौकरियां सृजित करने और मूल्य वृद्धि को नियंत्रित करने के वादे को पूरा करने में विफल रही है और अब देश में लोगों को भड़काने का काम कर रही है।


कांग्रेस ‘कट्टरपंथियों’ के दबाव में आ गई
भाजपा ने समान नागरिक संहिता को लेकर कांग्रेस को घेरा। पार्टी ने कहा कि कांग्रेस ‘कट्टरपंथियों’ के दबाव में आ गई है और वोट बैंक की राजनीति के लिए इस कदम का विरोध कर रही है। पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता शहजाद पूनावाला ने कहा कि भाजपा समान नागरिक संहिता को लागू कराने के लिए प्रतिबद्ध है।

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