सूत्रों ने बताया कि रेलवे को एक श्रमिक स्पेशल ट्रेन के संचालन के लिए हर चक्कर पर 80 लाख रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। रेलवे ने इन ट्रेनों में स्लीपर क्लास टिकट के किराए के अलावा 30 रुपये सुपरफास्ट चार्ज और 20 रुपये स्पेशल ट्रेन चार्ज भी जोड़ा है।
हालांकि केंद्र सरकार का दावा है कि यह किराया प्रवासियों से वसूलने के बजाय 85 फीसदी बोझ रेलवे वहन कर रहा है, जबकि 15 फीसदी खर्च राज्यों से लिया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि पहली 34 ट्रेन के संचालन पर रेलवे ने 24 करोड़ रुपये खर्च किए हैं, जबकि राज्यों से महज 3.5 करोड़ रुपया लिया गया है।
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70 हजार यात्री पहुंचाए गए
भारतीय रेलवे ने मंगलवार को बताया कि एक मई से चालू की गईं श्रमिक स्पेशल ट्रेनों से अब तक करीब 70 हजार यात्रियों को ढोया जा चुका है। इसमें करीब 50 करोड़ का खर्च आया है। सोमवार शाम तक करीब 67 श्रमिक स्पेशल ट्रेन चलाई जा चुकी थी, जबकि मंगलवार को 21 ट्रेन बंगलूरू, सूरत, साबरमती, जालंधर, कोटा, एरनाकुलम आदि के लिए चलाई जानी थी।हर ट्रेन औसतन 1000 यात्री लेकर चल रही है। 24 डिब्बों वाली ट्रेन के हर डिब्बे में 72 सीट होती हैं, लेकिन सोशल डिस्टेंसिंग के चलते 54 सीटों पर ही यात्री बैठाए जा रहे हैं।