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क्या हर जांच सीबीआई को दें?: बेहतर होगा कि यूपी पुलिस को ही खत्म कर दें, जानें सुप्रीम कोर्ट क्यों हुआ नाराज

Wed, 30 Sep 2026 02:19 PM IST
अस्मिता त्रिपाठी न्यूज डेस्क, अमर उजाला नई दिल्ली।

सार

सुप्रीम कोर्ट ने एक आपराधिक जांच में को लेकर यूपी पुलिस को कड़ी फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि अगर जांच इसी तरह होगी तो लोगों का भरोसा कैसे कायम रहेगा। नाराजगी जताते हुए बेंच ने सभी जांच सीबीआई को सौंपने और यूपी पुलिस को भंग करने की टिप्पणी की। आइए जानते हैं क्या है पूरा मामला? 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक आपराधिक जांच के दौरान उत्तर प्रदेश पुलिस के कामकाज पर कड़ी नाराजगी जताई। इसके साथ ही कहा कि वह राज्य में सभी जांच का काम सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन (सीबीआई) को सौंपने का आदेश भी दे सकती है।
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जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस संजीव सचदेवा की बेंच ने टिप्पणी की कि वे यूपी पुलिस को भंग कर सकते हैं। इसके साथ ही सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशन यानी की सीबीआई को राज्य में सभी जांच अपने हाथ में लेने का निर्देश दे सकते हैं।

कोर्ट ने क्या कहा? 
कोर्ट ने कहा, 'हर चीज में आपका कोई न कोई एजेंडा होता है। अगर आप मामलों को इस तरह से संभालेंगे तो लोग आप पर कैसे भरोसा करेंगे? बेहतर होगा कि हम सीबीई से यूपी पुलिस की सभी जांचों को संभालने के लिए कहें। हम यूपी पुलिस को भंग भी कर सकते हैं। यह बकवास किसी न किसी मोड़ पर तो रुकनी ही चाहिए।'
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क्या है पूरा मामला? 
कोर्ट ने ये कड़ी टिप्पणियां एक जांच में गंभीर अनियमितताओं पर ध्यान देने के बाद कीं, जिसमें पुलिस ने एक अज्ञात मोटरसाइकिल सवार के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी, जबकि शिकायतकर्ता ने संदिग्ध को मौके पर ही पकड़कर स्थानीय पुलिस के हवाले कर दिया था।

नियम के पालन को क्या कहा? 
जांच को जिस तरह से आगे बढ़ाया गया, उस पर निराशा जताते हुए बेंच ने टिप्पणी की।  बेंच ने कहा, 'नियमों का पालन करना एक बात है, लेकिन हद से ज्यादा झुक जाना और इस तरह मामले को दबाने की कोशिश करना? इस बारे में जितना कम कहा जाए, उतना ही अच्छा है।' यह मामला खुद पेश होने वाली एक शिकायतकर्ता की ओर से दायर याचिका से जुड़ा था। उसने सुप्रीम कोर्ट के सामने कहा कि पुलिस की शुरुआती रिपोर्ट शुरू से ही पक्षपाती थी।

शिकायतकर्ता ने क्या बताया? 
उन्होंने बताया कि मोटरसाइकिल से जुड़ी एक घटना के बाद, उन्होंने खुद उस मोटरसाइकिल सवार को पकड़ा और पुलिस के हवाले कर दिया। लेकिन, पुलिस ने जानबूझकर अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की और आरोपी का कॉलम खाली छोड़ दिया।

याचिकाकर्ता ने यह भी बताया कि जब हाईकोर्ट ने दखल दिया और स्टेटस रिपोर्ट मांगी, तो पुलिस ने बाद में चार्जशीट में उस सवार का नाम शामिल किया, लेकिन बाद में उसे क्लीन चिट दे दी। उन्होंने यह भी बताया कि जिस मोटरसाइकिल पर जब्ती के समय कोई नंबर प्लेट नहीं थी। उसे जांच के दौरान रहस्यमय तरीके से एक रजिस्ट्रेशन नंबर दे दिया गया।

बेंच ने यूपी पुलिस से क्या सवाल किया? 
बेंच ने उत्तर प्रदेश पुलिस का प्रतिनिधित्व कर रहे वकील से सवाल किया, 'क्या अज्ञात लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी? अगर व्यक्ति को मौके पर ही पकड़ लिया गया था, तो आपने अज्ञात क्यों लिखा? लोग पुलिस पर कैसे भरोसा करेंगे?'

कोर्ट ने यह भी कहा कि यूपी पुलिस का जवाब वाला हलफनामा बिल्कुल भी संतोषजनक नहीं था। इसलिए, कोर्ट ने संबंधित पुलिस अधिकारी को अगली सुनवाई की तारीख पर कोर्ट में पेश होने और यह बताने का निर्देश दिया कि एफआईआर में आरोपी का नाम क्यों शामिल नहीं किया गया था।
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