पंजाब में टूटे अकाली और भाजपा गठबंधन का असर दिखेगा उत्तर प्रदेश में
कभी उत्तर प्रदेश में सिखों और पंजाबियों को कांग्रेस का वोट बैंक माना जाता था, लेकिन 1984 की घटना के बाद पंजाब से तराई इलाके में आकर बसे सिखों का भरोसा शुरुआत से ही अकाली दल के साथ जुड़ा हुआ है। चूंकि पंजाब में अकाली और भाजपा का गठबंधन था इसलिए उत्तर प्रदेश में इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को सिखों और पंजाबियों के बाहुल्य वाली सीटों पर मिलता रहा। इस बार तस्वीर बदली हुई है। पंजाब में होने वाले विधानसभा चुनाव में अकाली और भाजपा का 25 साल पुराना नाता टूट चुका है। राजनीतिक विशेषज्ञों का कहना है इसका असर उत्तर प्रदेश में भी दिखेगा।
समाजवादी पार्टी भी सिखों के लिए अकाली नेता को लाई थी उत्तर प्रदेश
कभी अकाली दल के कद्दावर नेताओं में शामिल पूर्व सांसद बलवंत सिंह रामूवालिया पर समाजवादी पार्टी ने भी दांव लगाया। बलवंत सिंह रामूवालिया उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री बनाए गए। बलवंत सिंह रामूवालिया ने उत्तर प्रदेश के तराई और सिख तथा पंजाबी बाहुल्य इलाकों में समाजवादी पार्टी के लिए ज्यादा से ज्यादा वोटों को अपनी ओर मोड़ने के लिए अभियान भी चलाया। इसी तरीके से बसपा ने उत्तर प्रदेश के तराई इलाके में खासकर पीलीभीत, लखीमपुर और शाहजहांपुर के इलाके में पंजाबी नेता रोमी साहनी पर दांव लगाया। इसी इलाके में बड़े किसान नेता और सांसद मेनका गांधी के चचेरे भाई वीएम सिंह भी सिखों के बड़े नेता के तौर पर उभरे।