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अंतरिक्ष में आत्मनिर्भर: जो विकसित देश हमें मुंह चिढ़ाते थे, आज इसरो से अपने उपग्रह भिजवाने को मजबूर

Sat, 15 Aug 2020 06:12 AM IST
योगेश साहू न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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अंतरिक्ष में भारत - फोटो : Amar Ujala
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1962 में अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए महान वैज्ञानिक विक्रम साराभाई ने इससे देश के सतत विकास में सहयोग और मानव जीवन उन्नत बनाने का सपना देखा था। साराभाई का कहना था कि भारत हमेशा शांतिपूर्ण उद्देश्यों और आम जनजीवन व समाज की समस्या सुलझाने के लिए अंतरिक्ष कार्यक्रम का उपयोग करेगा।

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लेकिन इसके लिए स्वदेशी तकनीक बढ़ाने पर जोर देना होगा। साराभाई के इस संकल्प को साकार करते हुए हमारे वैज्ञानिकों ने प्रक्षेपण यान और सैटेलाइट तकनीक में महारत हासिल की। प्रक्षेपण यान का आत्मनिर्भर सिस्टम विकसित किया और जटिल स्पेस्क्राफ्ट तकनीक हासिल की।

कुछ दशक पहले तक देश की कमजोर माली हालत के मद्देनजर सस्ती स्वदेशी तकनीक और क्षमता की ओर कदम बढ़ाने शुरू किए। उसी का नतीजा है कि आज इसरो इन दोनों मोर्चों पर दुनिया में अपनी खास जगह बना चुका है। नाज की बात है कि जो विकसित देश हमें अंतरिक्ष तकनीक देने से इनकार करते थे, आज वे हमसे अपने उपग्रह लॉन्च कराते हैं।
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पिछले कुछ वर्षों में तो इसरो दुनिया का प्रमुख सफल शोध और विकास संस्थान बनकर उभरा है। उसने न सिर्फ ब्रह्मांड को जानने के लिए आधुनिक उन्नत तकनीकें इजाद की हैं बल्कि धरती पर मानव जीवन सुगम बनाने पर भी उतना ही ध्यान रखा है।

जब नासा भेज रहा था अपोलो तब इसरो बना भी नहीं था
जब अमेरिकी संस्थान नासा 1969 में चांद पर मानव मिशन अपोलो भेज रहा था तब तक इसरो अस्तित्व में ही नहीं था। लेकिन महज 50 साल के सफर में इसने वैज्ञानिक-इंजीनियरिंग प्रतिभा और स्वदेशी तकनीकी नवाचार के जरिए दुनिया को हतप्रभ कर दिया है।

आज इसरो न सिर्फ सबसे कम खर्चीले सैटेलाइट लॉन्च करता है बल्कि चंद्रयान-2 जैसे मिशन से अपने दम पर अंतरिक्ष के अनजाने पहलुओं तक पहुंचने की कोशिश कर रहा है। गौर करने वाली बात यह है कि नासा के मुकाबले इसरो का बजट 14 गुना कम है। नासा को सालाना अमेरिकी सरकार से 21 अरब डॉलर मिलते हैं तो इसरो महज 1.5 अरब डॉलर में अपने मुकाम हासिल कर रहा है।

घरेलू तकनीक से ढूंढा कामयाबी का रास्ता

एक दौर था जब कई विकसित देश हमारे अंतरिक्ष कार्यक्रमों को खारिज करते हुए मुंह चिढ़ाते थे। लेकिन कभी साइकिल और बैलगाड़ी पर प्रक्षेपण सामान ले जाते दिखने वाले हमारे वैज्ञानिक आज दुनिया की आधुनिक तकनीक से लैस है। इसरो से जुड़े रहे  और डीआरडीओ के पूर्व चीफ कंट्रोलर ए शिवाथानु पिल्लई कहते हैं कि इसरो ने अपनी कामयाबी का रास्ता स्वदेशी तकनीक में ही ढूंढा। मसलन, मिसाइल टैक्नोलॉजी कंट्रोल रेजीम (एमटीसीआर) इस स्वदेशी अभियान की देन रही।

पीएसएलवी टर्निंग प्वॉइंट
इसरो के वैज्ञानिकों ने रॉकेट और अच्छे सॉफ्टवेयर लगे मिसाइल गाइडेंस सिस्टम, उच्च ऊर्जा वाले प्रणोदक, अंडरवॉटर प्रणाली, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध प्रणाली, सटीक रडार और कूटलिपि की अपनी पद्धतियां ईजाद कीं। पीएसएलवी का विकास टर्निंग प्वॉइंट रहा। इसके जरिए इसरो ने भारी पेलोड के साथ एक के बाद एक कई सैटेलाइट लॉन्च किए। इस कामयाबी को देखकर विकसित देश भी हैरान रह गए।
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बड़े लक्ष्यों की ओर कदम

इसरो अब रक्षा सैटेलाइट, कॉमर्शियल लॉन्च सेवा, ग्रहों के मिशन और देश के अंतरिक्ष यात्रियों पर ध्यान लगा रहा है। अगले दो वर्षों में वह कई अहम मिशन को अंजाम देने वाला है। इनमें चंद्रयान-3 से लेकर 2022 का मानव मिशन गगनयान शामिल है। साथ ही 2030 तक चांद पर अंतरिक्ष यात्री उतारने की योजना है। एक अन्य अहम कार्यक्रम जियोसिंक्रोनस कक्षा में ऊर्जा उत्पन्न करने वाले सौर ऊर्जा चालित उपग्रह हो सकते हैं।

स्वदेशी तकनीक का दम अंतरिक्ष में इसरो ने गाड़ा झंडा
  • वर्ष 1975 : इसरो ने स्थापना के 06 साल बाद पहला अंतरिक्ष सैटेलाइट आर्यभट्ट डिजाइन किया था।
  • वर्ष 1984 : भारत की ओर से पहले अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा सोवियत रूस के मिशन पर भेजे गए।
  • वर्ष 2013, 05 नवंबर: इसरो ने मंगल की कक्षा में अपना पहला यान भेजा। मंगल की कक्षा में मिशन भेजने वाला पहला एशियाई देश बना भारत। खास बात यह कि भारत इस मिशन को पहले प्रयास में ही सफलतापूर्वक अंजाम देने वाला पहला देश बना।
  • वर्ष 2018, 12 अप्रैल: अमेरिका के जीपीएस को टक्कर देने के लिए लॉन्च हुआ नाविक। यह जल्द ही भारत में बड़े पैमाने पर नागरिकों और सेना के लिए इस्तेमाल होने लगेगा।
  • वर्ष 2019, 27 मार्च: एंटी सैटेलाइट मिसाइल का सफल परीक्षण कर अपनी ताकत में इजाफा किया। इस लॉन्च से भारत अमेरिका, रूस और चीन के बराबर खड़ा हो गया है।
  • वर्ष 2019, 22 जुलाई: चंद्रयान 2 मिशन को अंजाम दिया गया। हालांकि इसे हार्ड लैंडिग का सामना करना पड़ा था।
(इसरो अब तक 109 बार यान अंतरिक्ष में भेज चुका है, यही नहीं दिसंबर 2019 तक 33 देशों के 3015 से ज्यादा सैटेलाइट भेज चुका था।)

अंतरिक्ष में जल्द ही होंगे हमारे गगनयात्री
भारत के पहले मानवयुक्त अंतरिक्ष अभियान गगनयान मिशन की शुरुआत हो चुकी है। 'गगनयात्रियों' का प्रशिक्षण रूस के गागरिन सेंटर में चल रहा है, जहां चार भारतीयों ने असामान्य स्थिति में लैडिंग करने के लिए एक विशेष मॉड्यूल पर प्रशिक्षण पूरा कर लिया है। इन यात्रियों ने विशेष मॉड्यूल लैंडिंग के लिए फरवरी में जंगली और दलदली क्षेत्रों के प्रशिक्षण को पूरा किया था। वहीं, पानी की सतह पर रहने के अभ्यास को जून में पूरा कर लिया। गगनयान अभियान 2022 में भेजा जाएगा।
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