जम्मू-कश्मीर में आतंकियों के खिलाफ सुरक्षा बलों को खासी सफलता मिल रही है। नतीजा, आतंकी वारदातों में कमी आने लगी है। साल 2018 में जहां 601 आतंकी वारदात हुई थी, वहीं 2019 में 594 और 2020 में 244 वारदात सामने आई हैं। सुरक्षा बलों ने एक विशेष रणनीति के तहत सीमा पार से होने वाले अपराधों, जैसे घुसपैठ, आतंकवाद और तस्करी आदि को रोकने के लिए बहु-आयामी दृष्टिकोण अपनाया है। इसमें मोबाइल सर्विलांस और मानव संसाधन, दोनों तकनीक शामिल हैं। इनकी मदद से आतंकियों के ठिकाने की जानकारी मिल जाती है। निगरानी और मॉनिटरिंग डिवाइस के द्वारा घुसपैठ करने वाले या ठिकाने से बाहर निकलने का प्रयास कर रहे आतंकियों का पता लगाने में दिक्कत नहीं आती। मोबाइल सर्विलांस और मानव संसाधन, इस रामबाण तकनीक ने सुरक्षा बलों की राह काफी आसान कर दी है।
सुरक्षा बलों के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, इस तकनीक में 'सर्विलांस' और 'इंटेलिजेंस' अहम है। इसमें कई दूसरी एजेंसियों का भी सहयोग है। अगर पिछले दो साल के आंकड़ों पर गौर करें तो सुरक्षा बलों को आतंकियों के खिलाफ कई बड़ी कामयाबी मिली हैं। घाटी में भारतीय सेना, जम्मू-कश्मीर पुलिस और सीआरपीएफ, तीनों एजेंसियों के पास अपना एक खुफिया नेटवर्क है। इस मानव संसाधन तकनीक ने आतंकियों के खिलाफ विभिन्न ऑपरेशनों में सुरक्षा बलों की क्षमता को बढ़ा दिया है। हालांकि ऑपरेशनल दृष्टि से एजेंसियों का नाम यहां पर नहीं बताया जा सकता, लेकिन उनकी मदद से अब आतंकियों को घुसपैठ करने से लेकर उनके आगे बढ़ने तक की गतिविधि को ट्रैक करने में सफलता मिल रही है। अगर वे घाटी के बीच कहीं छिपे हैं तो ज्यादा देर तक वहां पर नहीं टिकते। उनके पास जो भी संचार का साधन है, उसे ट्रैक कर लिया जाता है। इससे उनकी लोकेशन आसानी से पता चल जाती है। यही वजह है कि अधिकांश ऑपरेशनों में सुरक्षा बल, आतंकियों के ठिकानों पर जाकर कार्रवाई कर रहे हैं।