निर्णय लेते वक्त धार्मिक पहलुओं को न छुएं : केंद्र
सुनवाई के दौरान एडिशनल सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ से आग्रह किया कि धारा-377 पर निर्णय लेते वक्त धार्मिक पहलुओं पर विचार न किया जाए। इस मामले को दो वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए गए संबंध तक ही सीमित रखा जाए।
उन्होंने कहा कि पीठ को धारा-377 को संवैधानिकता और वैधता पर अपनी चर्चा को तब तक सीमित रखना चाहिए जब तक यह दो समलैंगिक वयस्कों के बीच निजी तौर पर बने संबंधों को अपराध मानता है। जिसके लिए आजीवन कारावास की सजा तक हो सकती है।
उन्होंने पीठ के सामने एक किताब भी रखी, जिसमें कुछ धार्मिक कहानियां हैं। दरअसल याचिकाकर्ताओं के वरिष्ठ वकील अशोक देसाई ने कुछ देव गाथाओं में यौन विविधता का हवाला देते हुए कहा कि समान सेक्स के बीच प्रेम निस्वार्थ होता है।
इस पर मेहता ने कोर्ट से कहा कि धार्मिक मान्यताओं और चरित्रों को इस बहस से बाहर रखा जाना चाहिए। हालांकि उन्होंने दोहराया कि धारा-377 पर सुप्रीम कोर्ट का जो भी फैसला होगा, वह सरकार को मान्य होगा। मामले की अगली सुनवाई मंगलवार को होगी।
एलजीबीटी समुदाय को अधिकारों से महरूम रखा जा रहा : याचिकाकर्ता
याचिकाकर्ताओं के वकील कृष्णन वेणुगोपाल ने कहा कि धारा-377 बोलने व अभिव्यक्ति के अधिकार और अंतरात्मा के अधिकार के विपरीत है। हमें अपने विचार खुलेआम व्यक्त करने का अधिकार है लेकिन दंडात्मक प्रावधान की वजह से एलजीबीटी समुदाय ऐसा नहीं कर पा रहा है। उन्हें अधिकारों से महरूम रखा जा रहा है।
उन्होंने कहा कि एलजीबीटी समुदाय के साथ हो रहे भेदभाव को खत्म करने के लिए सकारात्मक कदम उठाने की जरूरत है। वहीं दो ईसाई संघों के वकील मनोज जॉर्ज ने धारा-377 को खत्म करने का विरोध करते हुए मामले में केंद्र सरकार पर यूटर्न लेने का आरोप लगाया। हालांकि एडिशनल सॉलिसिटर जनरल ने इन आरोपों का खंडन किया।