अब तक वैज्ञानिकों की चुंबकीय क्षेत्र को लेकर समझ हमारे सौरमंडल के आठ ग्रहों तक ही सीमित रही है। हालांकि, मंगल जैसे ग्रह के उदाहरण बताते हैं कि मजबूत चुंबकीय क्षेत्र न होने पर ग्रह बंजर हो सकते हैं, जबकि बृहस्पति जैसा विशाल ग्रह अपने तीव्र चुंबकीय क्षेत्र से तूफानों को नियंत्रित करता है।
हमारे सौरमंडल से परे लाखों ग्रह मौजूद हैं, जिन्हें बाह्य ग्रह या एक्सोप्लैनेट कहा जाता है। अब वैज्ञानिकों ने इन दूर-दराज ग्रहों की सतह पर मौजूद चुंबकीय क्षेत्रों की सीधी जांच का तरीका खोज लिया है।
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यह खोज न केवल इन ग्रहों की संरचना को समझने में मदद करेगी बल्कि यह भी स्पष्ट कर सकती है कि क्या ये ग्रह अपने तारों को प्रभावित करते हैं या खुद जीवन के अनुकूल बन सकते हैं। अब तक वैज्ञानिकों की चुंबकीय क्षेत्र को लेकर समझ हमारे सौरमंडल के आठ ग्रहों तक ही सीमित रही है। हालांकि, मंगल जैसे ग्रह के उदाहरण बताते हैं कि मजबूत चुंबकीय क्षेत्र न होने पर ग्रह बंजर हो सकते हैं, जबकि बृहस्पति जैसा विशाल ग्रह अपने तीव्र चुंबकीय क्षेत्र से तूफानों को नियंत्रित करता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि चुंबकीय क्षेत्र न केवल ग्रह की सतह की सुरक्षा करता है बल्कि उसकी जलवायु और मौसम प्रणाली को भी गहराई से प्रभावित करता है।
यह शोधपत्र प्रोबिंग एक्सोप्लैनेटरी मैग्नेटिक फील्ड्स विद हान्ले एंड जीमन पोलराइजेशन (हान्ले और जीमन ध्रुवीकरण द्वारा बाह्यग्रहों के चुंबकीय क्षेत्रों की पड़ताल) शीर्षक से प्रीप्रिंट सर्वर पर प्रकाशित हुआ है। अध्ययन में यह दर्शाया गया है कि विशेष रूप से बड़े आकार के और अपने तारे के नजदीक परिक्रमा करने वाले ग्रहों पर यह तकनीक प्रभावी ढंग से कार्य कर सकती है। यह शोध बाह्यग्रहों के वातावरण और तारों के साथ उनके परस्पर प्रभाव को समझने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है।
किन ग्रहों पर होगा प्रयोग
यह तकनीक फिलहाल उन बड़े ग्रहों पर ही लागू की जा रही है जो अपने तारों के अत्यंत करीब परिक्रमा करते हैं-जैसे हॉट ज्यूपिटर्स। इन ग्रहों के वायुमंडल से बड़ी मात्रा में फोटॉन गुजरते हैं, जिससे जांच संभव होती है। छोटे ग्रह या सूर्य से दूर स्थित ग्रह फिलहाल इस विश्लेषण के दायरे से बाहर हैं। नासा का आगामी मिशन हैबिटेबल वर्ल्ड्स ऑब्जर्वेटरी (एचडब्ल्यूओ) जो अगले 15 वर्षों में लॉन्च होने की योजना है, ऐसे ही बाह्यग्रहों के वायुमंडलीय और चुंबकीय आंकड़े इकट्ठा करने के लिए तैयार किया जा रहा है। तब तक मौजूदा जमीन आधारित और स्पेस वेधशालाएं भी प्रारंभिक माप संभव बना सकती हैं।