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केंद्र बनाम दिल्ली सरकार: प्रशासनिक सेवाओं को लेकर दिल्ली व केंद्र की टकराव पर तीन मार्च को सुनवाई

Tue, 15 Feb 2022 09:31 PM IST
निधि पाल न्यूज डेस्क, अमर उजाला, दिल्ली

सार

दिल्ली सरकार की तरफ से सीनियर अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने इस मामले को शीर्ष अदालत के सामने तत्काल सुनवाई की मांग की थी।
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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राष्ट्रीय राजधानी में प्रशासनिक सेवाओं पर नियंत्रण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच हुए कानूनी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट तीन मार्च को सुनवाई के लिए तैयार हो गया है।

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राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील डॉ. अभिषेक मनु सिंघवी ने मंगलवार को चीफ जस्टिस एनवी रमण की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ के समक्ष इस मामले का उल्लेख करते हुए तत्काल सूचीबद्ध करने का आग्रह किया। चीफ जस्टिस ने उनके आग्रह को स्वीकार्र करते हुए तीन मार्च को मामले को सूचीबद्ध करने के लिए सहमत हो गए।

फरवरी 2019 में सुप्रीम कोर्ट की दो-न्यायाधीशों की पीठ ने सेवाओं पर दिल्ली और केंद्र सरकार की शक्तियों के सवाल पर अलग-अलग फैसला दिया था और मामले को तीन न्यायधीशों की पीठ के पास भेज दिया था। गत वर्षअक्टूबर में भी इस मामले की तत्काल सुनवाई के लिए उल्लेख किया गया था जिस पर चीफ जस्टिस दशहरा की छुट्टियों के बाद इसे सूचीबद्ध करने पर सहमत हुए थे।
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वर्ष 2018 में जस्टिस एके सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण (अब दोनों सेवानिवृत्त) की पीठ ने खंडित फैसला दिया था। जस्टिस सीकरी ने कहा कि संयुक्त सचिव व उससे ऊपर के रैंक के अधिकारियों के स्थानांतरण व पोस्टिंग दिल्ली के उपराज्यपाल की शक्तियों के अधीन हैं जबकि अन्य अधिकारी दिल्ली सरकार के नियंत्रण में हैं। वहीं जस्टिस भूषण की राय अलग थी। उनका मानना था कि %सेवाएं% पूरी तरह से दिल्ली सरकार के दायरे से बाहर हैं।

साल 2014 में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद राजधानी के शासन में केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच अधिकारों को लेकर संघर्ष देखा गया है। दिल्ली सरकार का वर्तमान राज्यपाल के साथ और उनके पहले भी मतभेद रहा है। 

सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने फरवरी 2019 के फैसले से पहले 4 जुलाई 2018 को दिल्ली के शासन के लिए व्पापक पैमाने तय किए थे। इस ऐतिहासिक फैसले में कहा गया  था कि दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता है। लेकिन  उपराज्यपाल के अधिकारों को यह कहते हुए कम कर दिया गया था कि उनके पास 'स्वतंत्र निर्णय लेने की ताकत' नहीं है। उन्हें चुनी गई सरकार की सहायता और सलाह पर ही काम करना है। इस फैसले ने उपराज्यपाल के अधिकार क्षेत्र को जमीन, पुलिस और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित मामलों तक ही सीमित कर दिया था। अन्य सभी मामलों पर यह माना  था कि एलजी को मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह पर कार्य करना होगा।

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