उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने पर यथास्थिति को बरकरार है। न्यायालय ने तीन महीने के अंदर आदेश का पालन करने को कहा था जिसमें सरकार असफल रही। केंद्र, राज्य और व्यक्तियों द्वारा दायर की गई 84 याचिकाओं की सुनवाई करते हुए न्यायधीश एसए बोबडे और अब्दुल नजीर ने फिलहाल यथास्थिति बनाए रखने का निर्देश दिया है।
पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने पिछले साल सितंबर में पदोन्नति में आरक्षण देने का रास्ता साफ किया था। 12 नवंबर को अपने आदेश में न्यायालय ने कहा था कि अधिकारी मामले में सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले का पालन करने के लिए बाध्य हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने नागराज मामले के आदेश में बदलाव करते हुए राज्यों को अपने पहले के आदेश को संशोधित करके पदोन्नति में आरक्षण को उचित ठहराने के लिए पिछड़ेपन के लिए मात्रात्मक (परिणामक) डाटा जुटाने से छूट दी थी।
अदालत ने कहा कि आरक्षण देने से पहले प्रशासनिक दक्षता पर इसके प्रभाव को लेकर एक अध्ययन करने की आवश्यकता है। अदालत का कहना है कि इस मामले पर विस्तार से सुनवाई होनी जरूरी है। पीठ ने कहा, 'हम आज इसपर यथास्थिति को बनाए रखने को सही समझते हैं।' इससे पहले अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा था कि दिल्ली उच्च न्यायालय को इस तरह के आदेश पारित नहीं करने चाहिए।
वेणुगोपाल ने कहा कि एससी और एसटी समुदायों को सरकारी नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण से संबंधित विभिन्न मुद्दों पर सर्वोच्च न्यायालय फैसला करेगी। मगर उच्च न्यायालय का निर्देश केंद्र के लिए परेशानी है। जरनैल सिंह के मामले में फैसला देते हुए दिल्ली उच्च न्यायालय ने नवंबर में केंद्र को शीर्ष अदालत का फैसला लागू करने का निर्देश दिया था और तीन महीने के अंदर केंद्रीय नौकरियों में पदोन्नति में आरक्षण देने को कहा था चूंकि मामला लंबित होने के कारण नीति सालों से लागू नहीं हुई थी।
उच्च न्यायालय के आदेश को केंद्र सरकार ने उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी और अटॉर्नी जनरल ने पीठ से कहा कि तीन महीने में आरक्षण को लागू करना संभव नहीं है। उन्होंने अदालत से उच्च न्यायालय के आदेश पर रोक लगाने का अनुरोध करते हुए कहा, 'एससी-एसटी कर्मचारियों के प्रतिनिधित्व का पता लगाने के लिए सरकार को अपने सभी विभागों से पता करना होगा।'