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SC Updates: गुरुग्राम के DLF सिटी में अवैध निर्माण हटाने का हाईकोर्ट का आदेश रद्द, पढ़ें 'सुप्रीम' फैसला

Tue, 04 Nov 2025 07:22 PM IST
पवन पांडेय न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल तस्वीर) - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें गुरुग्राम के डीएलएफ सिटी में अवैध और अनधिकृत निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस विजय बिष्णोई की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह आदेश उन मकान मालिकों को सुने बिना पारित किया, जिन्हें मुकदमे में पक्षकार भी नहीं बनाया गया था। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को सुने बिना उसके खिलाफ आदेश देना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
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पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'न्याय का निष्पक्ष प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। किसी पक्ष को सुने बिना उसके अधिकारों पर फैसला नहीं दिया जा सकता।' हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक इस्तेमाल या नियमों के विरुद्ध निर्माण किया गया है, तो ऐसे अवैध निर्माणों को किसी भी तरह से संरक्षण नहीं दिया जा सकता।अदालत ने आगे कहा कि जो भी व्यक्ति इस आदेश से प्रभावित है, वह निर्धारित समय के भीतर हाईकोर्ट में आवेदन कर सकता है ताकि उसे मामले में पक्षकार के रूप में शामिल किया जा सके। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि इस आदेश की व्यापक रूप से जानकारी दी जाए, ताकि प्रभावित लोग समय रहते जुड़ सकें।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दो सप्ताह के भीतर प्रभावित व्यक्ति आवेदन नहीं करते हैं, तो हाईकोर्ट स्वतंत्र रूप से मामले की सुनवाई कर सकता है और उचित निर्णय ले सकता है। बता दें कि हाईकोर्ट ने पहले राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह दो महीने के भीतर हरियाणा डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन ऑफ अर्बन एरियाज एक्ट, 1975 की धारा 15 के तहत कार्रवाई करे। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि गुरुग्राम के डीएलएफ सिटी क्षेत्र में कई लोगों ने निर्माण नियमों का उल्लंघन किया है, जैसे कि आवासीय मकानों का व्यावसायिक उपयोग, अनुमत सीमा (एफएआर) से अधिक निर्माण, और अतिरिक्त मंजिलें बनाना। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन मकान मालिकों के लिए राहत लेकर आया है जिन्हें पहले बिना सुने ही अवैध निर्माण हटाने के आदेश से प्रभावित होना पड़ा था।
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कर्मचारियों से पूछा नहीं, इसलिए अवैध नहीं हो जाती बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली: सुप्रीम कोर्ट

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बायोमेट्रिक हाजिरी प्रणाली की शुरुआत सभी हितधारकों के फायदे के लिए है। इस प्रणाली की शुरुआत को सिर्फ इसलिए अवैध नहीं ठहराया जा सकता कि इसे लागू करने से पहले सरकारी कार्यालयों के कर्मचारियों से परामर्श नहीं किया गया।

जस्टिस पंकज मिथल और जस्टिस प्रसन्ना बी वराले की पीठ ने यह टिप्पणी करते हुए केंद्र सरकार की ओर से 2015 में दायर वह अर्जी मंजूर कर ली, जिसमें उड़ीसा हाईकोर्ट के 21 अगस्त 2014 के फैसले को चुनौती दी गई थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली (बीएएस) शुरू करने वाले परिपत्र कर्मचारियों से पूर्व परामर्श के बिना जारी किए गए थे और केंद्र सरकार के कार्यालयों के लिए स्थापना और प्रशासन संबंधी संपूर्ण नियमावली के अनुरूप नहीं थे।

शीर्ष कोर्ट ने कहा कि ओडिशा के प्रधान महालेखाकार (लेखा एवं हकदारी) कार्यालय में 1 जुलाई, 2013 से यह प्रणाली लागू की गई जिसके लिए उसी वर्ष 1 जुलाई, 22 अक्तूबर और 6 नवंबर को विभिन्न परिपत्र जारी किए गए। शीर्ष कोर्ट ने अपने हालिया आदेश में कहा कि तथ्यों और परिस्थितियों को देखते हुए इस प्रणाली की शुरुआत को अवैध नहीं ठहराया जा सकता। पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को रद्द कर दिया और प्रधान महालेखाकार कार्यालय को अपने विभिन्न परिपत्रों में उल्लिखित बायोमेट्रिक उपस्थिति प्रणाली लागू करने की अनुमति दे दी।
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