सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें गुरुग्राम के डीएलएफ सिटी में अवैध और अनधिकृत निर्माणों को हटाने का निर्देश दिया गया था। जस्टिस जेके महेश्वरी और जस्टिस विजय बिष्णोई की पीठ ने कहा कि हाईकोर्ट ने यह आदेश उन मकान मालिकों को सुने बिना पारित किया, जिन्हें मुकदमे में पक्षकार भी नहीं बनाया गया था। अदालत ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को सुने बिना उसके खिलाफ आदेश देना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।
पीठ ने अपने आदेश में कहा, 'न्याय का निष्पक्ष प्रशासन सुनिश्चित करने के लिए सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है। किसी पक्ष को सुने बिना उसके अधिकारों पर फैसला नहीं दिया जा सकता।' हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी आवासीय क्षेत्र में व्यावसायिक इस्तेमाल या नियमों के विरुद्ध निर्माण किया गया है, तो ऐसे अवैध निर्माणों को किसी भी तरह से संरक्षण नहीं दिया जा सकता।अदालत ने आगे कहा कि जो भी व्यक्ति इस आदेश से प्रभावित है, वह निर्धारित समय के भीतर हाईकोर्ट में आवेदन कर सकता है ताकि उसे मामले में पक्षकार के रूप में शामिल किया जा सके। राज्य सरकार को निर्देश दिया गया है कि इस आदेश की व्यापक रूप से जानकारी दी जाए, ताकि प्रभावित लोग समय रहते जुड़ सकें।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दो सप्ताह के भीतर प्रभावित व्यक्ति आवेदन नहीं करते हैं, तो हाईकोर्ट स्वतंत्र रूप से मामले की सुनवाई कर सकता है और उचित निर्णय ले सकता है। बता दें कि हाईकोर्ट ने पहले राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि वह दो महीने के भीतर हरियाणा डेवलपमेंट एंड रेगुलेशन ऑफ अर्बन एरियाज एक्ट, 1975 की धारा 15 के तहत कार्रवाई करे। राज्य सरकार ने हाईकोर्ट में अपनी रिपोर्ट में बताया था कि गुरुग्राम के डीएलएफ सिटी क्षेत्र में कई लोगों ने निर्माण नियमों का उल्लंघन किया है, जैसे कि आवासीय मकानों का व्यावसायिक उपयोग, अनुमत सीमा (एफएआर) से अधिक निर्माण, और अतिरिक्त मंजिलें बनाना। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन मकान मालिकों के लिए राहत लेकर आया है जिन्हें पहले बिना सुने ही अवैध निर्माण हटाने के आदेश से प्रभावित होना पड़ा था।