सुप्रीम कोर्ट ने मिलावटी दूध बेचने के 38 साल पुराने मामले में दोषसिद्धि और सजा के खिलाफ बुलंदशहर के विजेंदर सिंह (85) की याचिका पर यूपी सरकार से जवाब मांगा है। इससे पहले, छह जून को सुप्रीम कोर्ट ने विजेंदर सिंह की याचिका पर सहमति जताई थी।
जस्टिस अनिरुद्ध बोस और जस्टिस राजेश बिंदल की अवकाशकालीन पीठ ने सिंह के वकील अजेश कुमार चावला को अपील दायर करने में देरी का कारण स्पष्ट करने को कहा। चावला ने स्वीकार किया कि हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील दायर करने में 10 साल की देरी हुई, लेकिन यह जानबूझकर नहीं किया गया था। उन्होंने कहा, चूंकि विजेंद्र सिंह अदालत के रिकॉर्ड में दर्ज पते से अलग पते पर रह रहे थे, इसलिए उन्हें हाईकोर्ट के आदेश की जानकारी नहीं थी।
हाईकोर्ट ने 30 जनवरी 2013 को उसकी दोषसिद्धी को बरकरार रखा था और कैद की सजा को घटाकर छह महीने कर दिया था। करीब चार दशक तक जमानत पर रिहा रहे विजेंदर ने 20 अप्रैल 2023 को सरेंडर किया और 2000 रुपये का जुर्माना जमा किया। विजेंदर ने इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में दोषसिद्धी व सजा रद्द करने की मांग की है।
बता दें कि उत्तर प्रदेश के रहने वाले वीरेंद्र सिंह को 7 अक्टूबर, 1981 को मिलावटी दूध बेचते हुए पकड़ा गया था। बाद में 29 सितंबर, 1984 को एक ट्रायल कोर्ट द्वारा दोषी ठहराया गया था। ट्रॉयल कोर्ट द्वारा उन्हें एक साल के कठोर कारावास और खाद्य अपमिश्रण निवारण अधिनियम, 1954 के प्रावधानों के तहत 2,000 रुपये का जुर्माना लगाया था।
इसके बाद वीरेंद्र सिंह ने बुलंदशहर सत्र अदालत में ट्रॉयल कोर्ट के आदेश को चुनौती दी। तीन सालों तक चली सुनवाई के बाद सत्र अदालत ने 14 जुलाई, 1987 को निचली अदालत के आदेश की पुष्टि की और उनकी दोषसिद्धि और सजा को बरकरार रखा। जब सत्र अदालत से वीरेंद्र सिंह को राहत नहीं मिली तो उसने 28 जुलाई, 1987 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का रुख किया। कई सुनवाइयों के बाद अदालत ने 30 जनवरी, 2013 को एक आदेश पारित कर उनकी दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को घटाकर छह महीने के कठोर कारावास और 2,000 रुपये के जुर्माने में कर दिया। इसके बाद वीरेंद्र सिंह ने जो अभी तक जमानत पर थे, उन्होंने 20 अप्रैल, 2023 को ट्रायल कोर्ट के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। साथ ही हाई कोर्ट के आदेश के एक दशक से अधिक समय बाद 2,000 रुपये का जुर्माना जमा किया। इसके बाद उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया।