Telangana: हैदराबाद में पेड़ों की कटाई को लेकर तेलंगाना सरकार के अफसरों को सुप्रीम कोर्ट की फटकार को बीआरएस नेता केटीआर ने मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की 'गलतियों' का नतीजा बताया। उन्होंने अफसरों पर मंडराते जेल के खतरे का जिक्र करते हुए कांचा गचिबोवली के जंगलों की तुरंत बहाली की मांग की।
भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) के कार्यकारी अध्यक्ष के. टी. रामाराव (केटीआर) ने गुरुवार को कहा कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से तेलंगाना सरकार के अधिकारियों को दी गई सख्त चेतावनी मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी की 'गलतियों' का सीधा परिणाम है। उन्होंने कहा कि इन अधिकारियों पर अब जेल भेजे जाने का खतरा मंडरा रहा है।
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केटीआर की यह प्रतिक्रिया सुप्रीम कोर्ट की उस टिप्पणी पर आई, जिसमें शीर्ष कोर्ट ने हैदराबाद विश्वविद्यालय के पास पेड़ों की कटाई को 'पूर्व-नियोजित' बताया और कहा कि राज्य सरकार को इस नुकसान की भरपाई करनी होगी, नहीं तो अफसरों को जेल जाना पड़ सकता है। उन्होंने एक बयान में कहा,'आपकी (मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी) गलतियों की वजह से आपके अधीन काम कर रहे अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट से सख्त चेतावनी मिली है। जवाबदेही से बचने की कोशिश अब नहीं चलेगी। कांचा गचिबोवली के जंगलों की बहाली जरूरी है, नहीं तो कानूनी कार्रवाई के लिए तैयार रहें।'
उन्होंने इस मामले में 10 हजार करोड़ रुपये के कथित 'घोटाले' का भी जिक्र किया, जिसमें उन्होंने हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय (एचसीयू) की जमीन की कथित बिक्री को भ्रष्टाचार और विश्वासघात करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि छुट्टियों के दौरान बुलडोजार चलाकर हरियाली को नष्ट कर दिया गया, जो कि पर्यावरण कानूनों का खुला उल्लंघन है। केटीआर ने चेतावनी दी कि ऐसी लापरवाही पर्यावरण और कानून के शासन को नुकसान पहुंचा सकती है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को इस 'पूरे गड़बड़झाले' की जिम्मेदारी लेनी चाहिए।
कांग्रेस की प्रतिक्रिया
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर कांग्रेस नेता मधु यास्की ने पीटीआई से कहा कि पार्टी इस मुद्दे को गंभीरता से ले रही है। उन्होंने बताया कि कांग्रेस की तेलंगाना प्रभारी मीनाक्षी नटराजन को इस मसले को सुलझाने के लिए जिम्मेदारी दी गई है। वह विश्वविद्यालय के छात्रों और सामाजिक संगठनों से मुलाकात कर चुकी हैं और सरकार से मामले को वापस लेने की बात कर रही हैं, ताकि समाधान निकाला जा सके।
क्या है मामला?
तेलंगाना सरकार ने मार्च में हैदराबाद यूनिवर्सिटी के पास कांचा गचिबोवली की 400 एकड़ जमीन पर आईटी ढांचा विकसित करने की घोषणा की गई थी। इसका विश्वविद्यालय के छात्रों, संकाय और सामाजिक संगठनों ने जोरदार विरोध किया था।