उन्होंने यह भी कहा कि नागरिकों को साथ मिलकर प्रदर्शन करने का अधिकार है लेकिन शांतिपूर्ण ढंग से। उन्होंने कहा कि सरकार हमेशा सही नहीं होती। विरोध महात्मा गांधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन का मूल था। हम सभी गलतियां करते हैं। सरकार को प्रदर्शन का दमन करने का अधिकार नहीं है जब तक प्रदर्शन हिंसक रूप अख्तियार न कर ले। सही मायने में वह देश आजाद है जहां अभिव्यक्ति की आजादी है और कानून का शासन है।
सरकार और देश अलग-अलग चीज
जस्टिस गुप्ता ने कहा कि सरकार और देश दोनों अलग-अलग है। सरकार का विरोध करना देश का विरोध करना नहीं है। साथ ही कहा कि कोई भी संस्थान आलोचना से परे नहीं है, फिर चाहे वह न्यायपालिका हो, सशस्त्र बल हों। असहमति के अधिकार में ही आलोचना का अधिकार भी निहित है। अगर हम असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश करेंगे तो ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला होगा।
उन्होंने कहा कि मैंने पाया कि बार एसोसिएशन द्वारा प्रस्ताव पारित कर कहा जाता है कि उसके सदस्य किसी खास मामले में पैरवी नहीं करेंगे क्योंकि यह देश विरोधी है। ऐसा नहीं होना चाहिए। आप किसी को कानूनी सहायता देने से इनकार नहीं कर सकते। उन्होंने यह भी कहा कि अगर हम वर्षों पुरानी परंपराओं को चुनौती नहीं देंगे तो नई सोच विकसित नहीं होगी। नई सोच तभी आएगी जब हम पुरानी मान्यताओं व परंपराओं को चुनौती देंगे।
दुख की बात है कि आज देश में असहमति को देशद्रोह समझा जा रहा है। असहमति की आवाज को देश विरोधी या लोकतंत्र विरोधी करार देना सांविधानिक मूल्यों पर चोट पहुंचाना है। अगर आप अलग राय रखते हैं तो इसका मतलब यह नहीं कि आप देशद्रोही हैं या देश के प्रति सम्मान का भाव नहीं रखते।
- जस्टिस दीपक गुप्ता