सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सेना में महिला अफसरों को स्थायी कमीशन देने के मामले में 'मनमानी' पर सख्त नाराजगी जताई। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब महिला और पुरुष अफसर एक जैसी ट्रेनिंग और पोस्टिंग करते हैं, तो उनके आकलन के लिए अलग-अलग पैमाने क्यों रखे गए हैं। यह मामला शॉर्ट सर्विस कमीशन (एसएससी) की 13 महिला अफसरों से जुड़ा है, जिन्होंने स्थायी कमीशन से वंचित किए जाने को चुनौती दी है। इनमें लेफ्टिनेंट कर्नल वनीता पाधी, लेफ्टिनेंट कर्नल चंदनी मिश्रा, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा और अन्य अफसर शामिल हैं, जिन्होंने कठिन और संवेदनशील इलाकों में तैनाती के बावजूद स्थायी कमीशन नहीं पाया।
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क्या है 'नियुक्ति मानदंड'?
नियुक्ति मानदंड का मतलब होता है ऐसी जिम्मेदारी जहां अफसर को किसी बेहद कठिन, संवेदनशील या दुश्मन सीमा से जुड़े इलाके में कमान संभालनी पड़ती है। पुरुष अफसरों के लिए इस तरह की पोस्टिंग को उनकी वार्षिक गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) में 'मानदंड रिपोर्ट' के रूप में दर्ज किया जाता है। जबकि महिला अफसरों की रिपोर्ट में इसे 'गैर-मानदंड रिपोर्ट' बताया गया, जिससे उनके करियर और स्थायी कमीशन पर असर पड़ा।
महिला अफसरों की दलील
वरिष्ठ वकील मेनेका गुरुस्वामी, जो इन 13 महिला अफसरों का पक्ष रख रही थीं, ने कहा कि महिला अफसरों को पुरुषों की तरह लगातार स्थायी कमीशन को ध्यान में रखकर आंका ही नहीं गया। 2020 से पहले महिलाएं स्थायी कमीशन के लिए पात्र नहीं थीं, इसलिए उनकी एसीआर 2019 में फ्रीज कर दी गई। इससे उनका ग्रेडिंग और रिकॉर्ड कमजोर हो गया, जबकि उन्होंने भी कठिन क्षेत्रों में वही जिम्मेदारियां निभाईं जो पुरुष अफसर निभाते हैं।
उदाहरण के तौर पर, लेफ्टिनेंट कर्नल गीता शर्मा 'ऑपरेशन गलवां' में लद्दाख में कम्युनिकेशन की कमान संभाल चुकी हैं और लेफ्टिनेंट कर्नल स्वाति रावत 'ऑपरेशन सिंदूर' और जम्मू-कश्मीर के आतंक प्रभावित इलाकों में तैनात रहीं। गुरुस्वामी ने यह भी बताया कि एक महिला अफसर जिन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक से विमान वापस लाए थे, उन्हें सिर्फ एक हफ्ते बाद ही सेवा छोड़ने के लिए कहा गया।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस उज्जल भुयां और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने सेना से सवाल किया, 'जब महिला और पुरुष अफसर एक ही ट्रेनिंग और पोस्टिंग करते हैं, तो अलग-अलग पैमाने क्यों? क्या महिलाओं के लिए कोई अलग मूल्यांकन प्रणाली है?' कोर्ट ने कहा कि यह समस्या 'रूढ़िवादी सोच और वरिष्ठ अधिकारियों की पुरानी धारणाओं' से जुड़ी लगती है।
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संविधान का उल्लंघन
महिला अफसरों ने दलील दी कि यह भेदभाव संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 15 (लैंगिक भेदभाव पर रोक) का उल्लंघन है। फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाकर कहा था कि सेना में महिला अफसरों को केवल स्टाफ पदों तक सीमित रखना 'असंगत और अवैध' है। इसके बाद कोर्ट ने महिलाओं को स्थायी कमीशन देने का आदेश दिया था। यह सुनवाई बुधवार को पूरी नहीं हो सकी और अब गुरुवार को जारी रहेगी। इसके बाद नौसेना और वायुसेना की महिला अफसरों की याचिकाओं पर भी सुनवाई होगी, जिन्होंने स्थायी कमीशन न मिलने को चुनौती दी है।