सुप्रीम कोर्ट ने अपने 15 फरवरी के फैसले पर पुनर्विचार की मांग करने वाली याचिकाओं को खारिज किया है। इस फैसले में केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की चुनावी बांड योजना को रद्द किया गया था। मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) न्यायमूर्ति डी.वाई.चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति संजीव खन्ना, न्यायमूर्ति बी.आर.गवई, न्यायमूर्ति जे.बी.पारदीवाला और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने कहा कि रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट खामी नहीं है।
शीर्ष कोर्ट ने पुनर्विचार याचिकाओं पर खुली अदालत में सुनवाई के आग्रह को भी खारिज किया। पीठ ने अपने आदेश में कहा, पुनर्विचार याचिकाओं की जांच करने से पता चलता है कि रिकॉर्ड में कोई स्पष्ट खामी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के नियम 2013 के XLVII नियम 1 के तहत पुनर्विचार का कोई मामला नहीं बनता है। इसलिए पुनर्विचार याचिकाएं खारिज की जाती हैं। कोर्ट ने 25 सितंबर को यह आदेश दिया था। इसे शनिवार को अपलोड किया गया।
यह पुनर्विचार याचिकाएं वकील मैथ्यू जे. नेदुम्परा और अन्य की ओर से दायर की गई थी, जिनमें कहा गया था कि इस योजना से संबंधित मामला केवल विधायी और कार्यकारी नीति का विषय है।
याचिकाकर्ताओं ने दिया था ये तर्क
याचिकाओं में कहा गया था कि यह योजना विधायी और कार्यकारी नीति के क्षेत्राधिकार में आती है। कोर्ट ने यह ध्यान नहीं दिया कि याचिकाकर्ताओं ने अपने लिए कोई खास कानूनी नुकसान नहीं दिखाया है। इस कार उनकी याचिका को किसी निजी मामले की तरह नहीं देखा जा सकता। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नहीं देखा कि जनता की राय अलग हो सकती है और कई लोग इस योजना के समर्थन में हैं, जिसे उनके चुने हुए प्रतिनिधियों ने लागू किया है। इसलिए, उन्हें भी अपनी बात कहने का अधिकार है।
'मतदाताओं को राजनीतिक दलों के फंडिंग का स्त्रोत जानने का अधिकार'
शीर्ष कोर्ट ने 15 फरवरी के आदेश में कहा था कि 2018 की चुनावी बांड योजना सांविधानिक अभिव्यक्तिकी आजादी और सूचना के अधिकार का उल्लंघन है। कोर्ट ने इस योजना को रद्द कर दिया था। कोर्ट ने कहा था कि मतदाता को राजनीतिक दलों के फंडिंग के स्त्रोत के बारे में जानने का अधिकार है। इस योजना ने उस अधिकार का उल्लंघन किया है। इसके बाद कोर्ट ने भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) को बांड के खरीददारों और प्राप्तकर्ताओं का विवरण जारी करने का निर्देश दिया था।