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Places of Worship Act: सुप्रीम कोर्ट ने दी हस्तक्षेप याचिका की अनुमति, कुछ प्रावधानों पर जताई गई है आपत्ति

Fri, 29 Jul 2022 10:28 PM IST
Amit Mandal न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया है कि अधिनियम हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के अधिकारों को छीनता है, जिससे आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट किए गए उनके पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों की बहाली का रास्ता मुश्किल हो जाता है। 
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सुप्रीम कोर्ट - फोटो : Social Media
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 की कुछ धाराओं की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ताओं को इसी मुद्दे पर पहले से लंबित याचिकाओं में हस्तक्षेप आवेदन दायर करने की स्वतंत्रता दी। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला की पीठ ने लंबित मामलों के साथ याचिकाओं को टैग करने से इनकार कर दिया और कहा कि वे मुख्य याचिका में अपनी बात रख सकते हैं। सुनवाई के दौरान पीठ ने पूछा कि इस मुद्दे पर कितनी याचिकाएं दायर की जाएंगी और कहा कि वे हस्तक्षेप आवेदन दायर कर सकते हैं।

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एक याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने कहा कि इन नई याचिकाओं को लंबित याचिकाओं के साथ जोड़ा जा सकता है। इस पर पीठ ने द्विवेदी से पूछा कि याचिकाकर्ता लंबित मामले में हस्तक्षेप क्यों नहीं करते? द्विवेदी ने कहा कि अब पीठ के समक्ष याचिकाओं को टैग किया जा सकता है और रजिस्ट्री को उसी मुद्दे पर आगे की याचिकाओं पर विचार नहीं करने के लिए कहा जा सकता है। चूंकि पीठ याचिकाओं को टैग करने के लिए इच्छुक नहीं थी, वरिष्ठ अधिवक्ता विजय हंसरिया ने भी एक याचिकाकर्ता की ओर से कहा कि कुछ अतिरिक्त बिंदु हैं जिन पर हो सकता है कि हस्तक्षेप आवेदन में विचार नहीं किया जाए। 

पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका में ये दलीलें दी गई हैं  
तब शीर्ष अदालत ने आदेश दिया कि याचिकाकर्ता मुख्य याचिका में प्रस्तुतियां करने के लिए स्वतंत्र होगा। पूजा स्थल अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिका में कहा गया है कि अधिनियम हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के अधिकारों को छीनता है, जिससे आक्रमणकारियों द्वारा नष्ट किए गए उनके पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों की बहाली का रास्ता मुश्किल हो जाता है। पूर्व संसद सदस्य चिंतामणि मालवीय, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी अनिल काबोत्रा, अधिवक्ता चंद्रशेखर, वाराणसी निवासी रुद्र विक्रम सिंह, स्वामी जितेंद्रानंद सरस्वती, मथुरा निवासी देवकीनंदन ठाकुर जी और एक धार्मिक गुरु ने हाल ही में 1991 के अधिनियम के खिलाफ शीर्ष अदालत में याचिका दायर की है। अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय की याचिका और अधिनियम को चुनौती देने वाली एक अन्य याचिका पर शीर्ष अदालत ने केंद्र को नोटिस जारी किया था।
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एक दलील में कहा गया है कि अधिनियम में भगवान राम के जन्मस्थान को शामिल नहीं किया गया है, लेकिन इसमें भगवान कृष्ण का जन्मस्थान शामिल है, हालांकि दोनों ही भगवान विष्णु के अवतार हैं और पूरी दुनिया में समान रूप से पूजे जाते हैं। दलीलों में आगे कहा गया है कि यह अधिनियम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत गारंटीकृत पूजा स्थलों और तीर्थस्थलों को पुनर्स्थापित करने, प्रबंधित करने, बनाए रखने और प्रशासन करने के हिंदुओं, जैनियों, बौद्धों और सिखों के अधिकार का स्पष्ट रूप से उल्लंघन करता है। दायर याचिकाओं ने पूजा के स्थान (विशेष प्रावधान) अधिनियम 1991 की धारा 2, 3 और 4 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी है, जिसमें कहा गया है कि यह अनुच्छेद 14, 15, 21, 25, 26, 29 का उल्लंघन करता है और धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है।  

न्यायिक विस्टा की मांग वाली याचिका पर विचार से इनकार 

सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : सोशल मीडिया
वहीं, सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को एक ‘न्यायिक विस्टा’ की स्थापना की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। शीर्ष अदालत ने कार्यपालिका और भारत के मुख्य न्यायाधीश की शक्तियों में हस्तक्षेप करने में असमर्थता व्यक्त की। जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने कहा कि शीर्ष अदालत के आसपास बुनियादी ढांचे को विकसित करने का कर्तव्य सरकार का है। यह एक ऐसा मामला है जो कार्यपालिका के क्षेत्र में है। जस्टिस गवई ने मौखिक रूप से टिप्पणी की, इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह सरकार का कर्तव्य है लेकिन यह कार्यकारी क्षेत्र में आता है।

ओआरओपी के फैसले के खिलाफ दायर पुनर्विचार याचिका खारिज

OROP
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार द्वारा तीनों रक्षा बलों के लिए अपनाए गए वन रैंक-वन पेंशन (ओआरओपी) सिद्धांत को बरकरार रखने के फैसले पर पुनर्विचार करने की मांग वाली याचिका को खारिज कर दिया है। शीर्ष अदालत ने कहा कि उसके द्वारा दिया गया आदेश न तो किसी सांविधानिक दुर्बलता से ग्रस्त है और न ही यह मनमाना है। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रम नाथ की पीठ ने कहा कि पुनर्विचार याचिका में कोई दम नहीं है। 

नगालैंड में जनवरी 2023 में होंगे निगम चुनाव

SC/ST Act
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को नगालैंड सरकार को निगमों और नगर परिषदों में जनवरी, 2023 तक चुनाव कराने का निर्देश दिया। जस्टिस संजय किशन कौल और जस्टिस एमएम सुंदरेश की पीठ ने इसके साथ ही मामले को फरवरी, 2023 के लिए सूचीबद्ध किया। पीठ पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल राइट्स की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
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अन्नाद्रमुक विवाद पर शीर्ष अदालत का निर्देश

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सुप्रीम कोर्ट ने अन्नाद्रमुक पार्टी की आम परिषद की बैठक के खिलाफ ओ. पनीरसेल्वम गुट की याचिका पर मद्रास हाईकोर्ट को तीन हफ्ते के भीतर फैसला करने का शुक्रवार को निर्देश दिया। प्रधान न्यायाधीश एनवी. रमण की अध्यक्षता वाली एक पीठ ने ओ. पनीरसेल्वम और ई. पलानीस्वामी गुटों से पार्टी के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने को भी कहा। गौरतलब है कि पार्टी की आम परिषद की बैठक में अन्नाद्रमुक में दोहरे नेतृत्व वाले ‘मॉडल’ को समाप्त कर दिया गया था और ई. पलानीस्वामी को पार्टी के अंतरिम महासचिव के रूप में पदोन्नत किया गया था। वहीं, ओ. पनीरसेल्वम को ‘पार्टी-विरोधी’ गतिविधियों के आरोप में निष्कासित कर दिया गया था।
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