सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को उस व्यक्ति को बरी कर दिया, जिसे 2010 में अपनी मां की हत्या के मामले में उम्रकैद की सजा दी गई थी। कोर्ट ने कहा कि मामले की शुरुआत और प्रकृति को लेकर संदेह बना हुआ है, जिसे स्पष्ट नहीं किया जा सका। जस्टिस केवी विश्वनाथन और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट की औरंगाबाद पीठ के जुलाई 2013 में दिए फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें निचली अदालत की ओर से दी गई दोषसिद्धि को बरकरार रखा गया था।
अभियोजन पक्ष का क्या आरोप है?
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि मृतका के अंतिम संस्कार की प्रक्रिया जल्दीबाजी में की गई, लेकिन बाद में शव को चिता से हटाया गया, क्योंकि उसकी गर्दन पर गला घोंटने के निशान और सिर के पिछले हिस्से में चोट के निशान पाए गए थे। शीर्ष कोर्ट ने टिप्पणी की कि पूरा मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। कोर्ट ने कहा, इस मामले की उत्पत्ति और मूल घटनाक्रम को लेकर रहस्य बना हुआ है।
पीठ ने चार गवाहों की गवाही का हवाला दिया, जिनमें कुछ पुलिस अधिकारी भी शामिल थे। इन सभी ने यह माना कि 22 जुलाई 2010 की सुबह वह उस स्थान पर पहुंचे, जहां पहली बार अंतिम संस्कार की कोशिश हुई थी। कोर्ट ने कहा, इन गवाहों की पूरी गवाही के बाद हमारे मन में अब भी यह संदेह है कि उस समय और स्थान से जुड़े अहम सुराग क्यों नहीं जुटाए गए और यह जांच क्यों नहीं की गई कि उस अंतिम संस्कार की व्यवस्था किसने की थी।
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मेडिकल रिपोर्ट में भी नहीं थी स्पष्ट राय
पीठ ने कहा कि वहां इकट्ठा हुई भीड़ में से किसी से भी पूछताछ नहीं की गई, न ही उन्हें कोर्ट में पेश किया गया। कोर्ट ने कहा कि भीड़ की जांच न किया जाना समझ से परे है, जबकि यह घटना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा था। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी गौर किया कि मेडिकल रिपोर्ट में भी स्पष्ट राय नहीं थी और मेडिकल विशेषज्ञ की गवाही में काफी अस्पष्टता थी। इसलिए यह पूरी तरह से नहीं कहा जा सकता कि यह आत्महत्या का मामला नहीं हो सकता।
अभियुक्त की ओर से वकील ने कोर्ट को बताया कि जांच के दौरान पुलिस को लातूर के एक अस्पताल से 26 सितंबर 1989 को जारी एक प्रमाण पत्र मिला, जिससे पता चलता है कि मृतका 'स्किजोफ्रेनिया' (मानसिक बीमारी) से पीड़ित थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अभियोजन का आरोप था कि मकान-जायदाद के लिए बेटे ने मां की हत्या की। लेकिन कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष अपने इस मकसद को साबित करने में पूरी तरह विफल रहा। कोर्ट ने यह भी कहा, दस्तावेजों में आया है कि अभियुक्त के पिता और दो बहनें अभी भी जीवित हैं।
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भूल कर बैठीं निचली अदालतें: सुप्रीम कोर्ट
कोर्ट ने कहा, ऐसा नहीं है कि मृतका की मौत के बाद सारी संपत्ति सीधा अभियुक्त को ही मिल जाती, खासकर जब तक हत्या सामने नहीं आती। इसलिए, मकसद साबित नहीं हुआ और निचली अदालतें साक्ष्यों के आधार पर आरोपी को दोषी ठहराने में गंभीर भूल कर बैठीं। सुप्रीम कोर्ट ने अभियुक्त की अपील को स्वीकार करते हुए उसे सभी आरोपों से बरी कर दिया।
इस मामले में निचली अदालत ने दो लोगों को दोषी ठहराया था और उन्हें उम्रकैद की सजा सुनाई थी। बाद में हाईकोर्ट ने एक आरोपी को बरी कर दिया था, लेकिन मुख्य आरोपी की सजा को बरकरार रखा था, जिसे अब सुप्रीम कोर्ट ने भी बरी कर दिया है।