शीर्ष अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि यह एक 'असाधारण मामला' है। आरोपी की जमानत न केवल न्याय की भावना के खिलाफ थी, बल्कि इससे समाज में गलत संदेश भी जा सकता था। कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसी परिस्थितियों में, अदालतें जमानत रद्द करने का पूरा अधिकार रखती हैं।
बिहार के एक राज्य-नियंत्रित महिला सुरक्षा गृह में रह रही महिलाओं के साथ यौन शोषण और मानसिक उत्पीड़न का चौंकाने वाला मामला सामने आया। इस सुरक्षा गृह की पूर्व अधीक्षिका पर आरोप है कि उसने न केवल महिलाओं को नशीले पदार्थ देकर बेहोश किया, बल्कि उन्हें बाहर भेजकर प्रभावशाली लोगों से यौन शोषण भी करवाया। सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और संदीप मेहता की पीठ ने कहा, 'यह ऐसा मामला है जिसमें रक्षक की भूमिका में नियुक्त व्यक्ति खुद ही राक्षस बन गया।'
जमानत क्यों रद्द की गई?
आरोपी को पटना हाई कोर्ट ने 18 जनवरी 2024 को जमानत दी थी। एक पीड़िता (जो अनुसूचित जाति से है) की ओर से सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई कि उसकी जानकारी या सहमति के बिना आरोपी को जमानत मिल गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एससी/एसटी एक्ट के तहत दर्ज मामलों में पीड़ित को पक्ष बनाए बिना जमानत नहीं दी जा सकती।
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एफआईआर कैसे दर्ज हुई?
एक अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट में सुरक्षा गृह की महिलाओं के साथ हो रहे अमानवीय बर्ताव का खुलासा हुआ था। इसके बाद पटना हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और जांच का आदेश दिया। जांच की निगरानी हाई कोर्ट की तरफ से की गई थी।
जांच में हुए चौंकाने वाले खुलासे
जांच में पता चला कि पीड़िताओं को इंजेक्शन और नशीली दवाएं दी जाती थीं। फिर उन्हें सुरक्षा गृह से बाहर ले जाकर प्रभावशाली लोगों से यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया जाता था। उन्हें मानसिक और शारीरिक शोषण के साथ-साथ, उन्हें धमकाया भी जाता था।
पीड़िता की सुरक्षा और आरोपी के आत्मसमर्पण का निर्देश
इसके साथ शीर्ष अदालत ने पटना प्रशासन को निर्देश दिया कि पीड़िता को पूरी सुरक्षा दी जाए। साथ ही, उसे मानसिक और कानूनी सहायता भी उपलब्ध कराई जाए। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया कि आरोपी पूर्व अधीक्षिका को चार सप्ताह के भीतर संबंधित ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।