हालांकि इस फिल्म में न हिंदू समाज के खिलाफ एक शब्द है और न ही राजूपतों और रानी पद्मावती की गरिमा से कोई खिलवाड़ किया गया है। लेकिन फिल्म को बिना देखे ही
करणी सेना के नाम पर हो रहे हिंसक विरोध को अब राजपूत आक्रोश के साथ साथ हिंदू आक्रोश का नाम भी दिया जा रहा है।
हाल ही में दिल्ली और अन्य शहरों में हुई पद्मावत की विशेष स्क्रीनिंग जिन्होंने देखी है, जिनमें यह संवाददाता भी शामिल है, की मानें तो भंसाली की इस फिल्म में राजपूतों के शौर्य, रानी पद्मावती की बुद्धिमत्ता और बलिदान और रावल रतन सिंह के उसूल और वीरता का ही गौरवगान किया गया है। फिल्म में राजपूतों और हिंदू समाज के खिलाफ एक भी संवाद, शब्द या दृश्य, गाना या नृत्य नहीं है। जिस घूमर नृत्य को लेकर सबसे ज्यादा विवाद है, वह भी राजमहल के भीतर महिलाओं के ही बीच है और उसे सिर्फ राज परंपरा के मुताबिक रावल रतन सिंह ही देख रहे हैं।
नृत्य करने वाली रानी पद्मावती एवं अन्य महिलाओं की वेशभूषा में भी कहीं कोई आपत्तिजनक बात नहीं दिखती। फिल्म की कहानी भी मोटे तौर पर वही है जो अभी तक सुनी और पढ़ी जाती रही है। बल्कि फिल्म में अलाउद्दीन खिलजी को बेहद जालिम, वहशी और यौन कुंठित सुल्तान के रूप में दिखाया गया है और मशहूर सूफी संत और विद्वान अमीर खुसुरो को गैरजरूरी ढंग से खिलजी के दरबारी शायर के रूप में प्रदर्शित किया गया है।
फिल्म के प्रारंभ में ही यह स्पष्ट किया गया है कि यह फिल्म इतिहास का चित्रण नहीं बल्कि मशहूर सूफी विद्वान मलिक मुहम्मद जायसी की अमर कृति पद्मावत की कहानी पर आधारित है। फिल्म के कुछ कथित विवादित अंशो को लेकर अभी तक करणी सेना के विरोध को राजपूत समाज के आक्रोश के रूप में बताया जा रहा था। लेकिन अब सोशल मीडया और टीवी चैनलों पर इसके विरोधियों ने इसे पूरे हिंदू समाज के सम्मान के खिलाफ बताना शुरु कर दिया है।
फिल्म के एक चरित्र चित्तौड़ के राजगुरु राघन चेतन की रानी पद्मावती पर कृदृष्टि और फिर देश निकाले की सजा के बाद उसका खिलजी से मिलकर उसे रानी पद्मावती के सौंदर्य का वर्णन करते हुए हासिल करने के लिए चित्तौड़ पर हमला करके उकसाने के प्रसंग को अब ब्राह्मणों की छवि खराब करने से जोड़ा जा रहा है। सोशल मीडिया पर इस आशय के संदेश फैलाकर हिंदुओं के ध्रुवीकरण का खेल शुरु हो गया है।