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Same Gender Marriage: CJI बोले- कोर्ट समलैंगिकों की इच्छा से नहीं चलती, हम देखते हैं कि संविधान क्या कहता है

Wed, 03 May 2023 07:58 PM IST
शिव शरण शुक्ला न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

मेनका गुरुस्वामी की दलील पर सीजेआई ने कहा कि आपके इस तर्क के साथ एक समस्या है। उन्होंने आगे कहा कि हम उन भावनाओं को समझते हैं जिनसे यह तर्क आता है, लेकिन संवैधानिक स्तर पर यह एक गंभीर समस्या है। हमें इस पर विचार कर फैसला नहीं देना कि युवा लोग अदालत से क्या चाहते हैं।
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समलैंगिक शादी
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विस्तार
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समलैंगिक विवाह को मंजूरी देने की मांग वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने बुधवार को सुनवाई की। इस दौरान, सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि हम समाज में प्रचलित नैतिकता या विभिन्न लोगों की नैतिकता पर नहीं चलते हैं। हम यह देखते है कि संविधान इस पर क्या कहता है। शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बुधवार को सुनवाई के दौरान उन दलीलों पर आई जिनमें कहा गया था कि अधिकांश समलैंगिक जोड़े केवल शादी करना चाहते हैं।  

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'अधिकांश समलैंगिक जोड़े शादी करना चाह रहे'
 सुनवाई के सातवें दिन पेश की जा रही दलीलों के दौरान याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता सौरभ कृपाल ने तर्क दिया कि उन्होंने विभिन्न सेमिनारों में समलैंगिक लोगों से बात की है। उनमें से 99 प्रतिशत लोगों का केवल यही कहना है कि वे शादी करना चाहते हैं। सौरभ कृपाल के साथ ही वरिष्ठ अधिवक्ता मेनका गुरुस्वामी ने कहा कि उन्होंने भी पाया है कि युवा समलैंगिक जोड़े शादी करना चाहते हैं। उन्होंने पीठ से कहा कि मैं एक कुलीन वकील के रूप में यह नहीं कह रही हूं। मैं यह इसलिए कह रही हूं कि मैनें इन युवाओं से मुलाकात की है। उन्होंने कहा कि वे लोग चाहते हैं कि सुप्रीम कोर्ट समलैंगिक शादी को मान्यता दें। उन्हें वह अनुभव न करने दें जो हमने अनुभव किया है। 

हम लोगों की भावनाओं के हिसाब से नहीं चलते- सुप्रीम कोर्ट
मेनका गुरुस्वामी की इस दलील पर सीजेआई ने कहा कि आपके इस तर्क के साथ एक समस्या है। उन्होंने आगे कहा कि हम उन भावनाओं को समझते हैं जिनसे यह तर्क आता है, लेकिन संवैधानिक स्तर पर यह एक गंभीर समस्या है। हमें इस पर विचार कर फैसला नहीं देना कि युवा लोग अदालत से क्या चाहते हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि अगर एक संवैधानिक अदालत के रूप में सुप्रीम कोर्ट युवा समलैंगिक जोड़ों की भावनाओं के अनुसार चलता है, तो यह अन्य लोगों की भावनाओं के बारे में बहुत सारे डेटा के अधीन भी होगा। ऐसे में इसमें हमें बिल्कुल नहीं पड़ना चाहिए। हमें ये विचार कर फैसला देना है कि संविधान की इच्छा क्या है। 
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सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दी यह दलील
इससे पहले, सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से उपस्थित सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने पीठ को बताया कि कैबिनेट सचिव की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया जाएगा। यह समिति समलैंगिक जोड़ों की वास्तविक मानवीय समस्याओं को दूर करने के लिए उठाए जा सकने वाले प्रशासनिक कदमों पर विचार और जांच करेगी। साथ ही यह समिति उनकी शादी को वैध बनाने के मुद्दे पर जाए बिना यह सब करेगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि सरकार इस मसले को लेकर सकारात्मक है और कैबिनेट सेक्रेटरी स्तर के अफसर की अगुवाई में एक कमेटी का गठन किया जाएगा। SG तुषार मेहता ने कहा कि जिस भी तरीके, रास्ते और माध्यम के जरिए समस्या का हल निकाला जा सकता है, हम सब करने के लिए तैयार हैं।

केंद्र ने यह दलील न्यायालय द्वारा 27 अप्रैल को पूछे गये एक सवाल के जवाब में दी। न्यायालय ने केंद्र से पूछा था कि क्या समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता दिये बगैर ऐसे जोड़ों को बैंक में संयुक्त खाता खुलवाने, भविष्य निधि में जीवन साथी नामित करने, ग्रेच्युटी और पेंशन जैसी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ दिया जा सकता है। केंद्र सरकार की ओर से न्यायालय में पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच-सदस्यीय संविधान पीठ से कहा कि इस तरह के जोड़ों की कुछ वास्तविक मानवीय चिंताओं और उनका प्रशासनिक स्तर से समाधान किये जा सकने के बारे में पिछली सुनवाई में चर्चा हुई थी।


 सीजेआई ने कही यह बात
सुनवाई के दौरान, CJI ने कहा कि याचिकाकर्ता शादी करने का अधिकार मांग रहे हैं और अदालत इस तथ्य से भी अवगत है कि शादी के अधिकार की घोषणा अपने आप में पर्याप्त नहीं है। जब तक कि इसे एक वैधानिक प्रावधान द्वारा लागू नहीं किया जाता है जो इसको मान्यता देता है और विवाहितों को अधिकार प्रदान करता है। पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता अटार्नी जनरल को या सॉलिसिटर जनरल को अपने सुझाव दे सकते हैं। दोनों पक्षों की ओर से पेश हुए वकील एक बैठक कर सकते हैं, जिसमें इन मुद्दों पर चर्चा की जा सकती है।

 याचिकाकर्ताओं में से एक की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा कि बैठक करना और सुझाव देना समस्या नहीं है, बल्कि विषय में महत्वपूर्ण मुद्दे शामिल हैं और जो कुछ सुझाया जा रहा है वह सुझावों के आधार पर एक समिति द्वारा की जाने वाली महज एक प्रशासनिक कवायद होगी। उन्होंने कहा कि पूर्वाग्रह के बगैर हम निश्चित तौर पर (सुझाव) देंगे, लेकिन व्यक्तिगत रूप से मुझे नहीं लगता कि उनके (सरकार के) पास कोई ठोस समाधान होगा। बेहतर होगा कि न्यायालय विषय पर फैसला देने के लिए आगे बढ़े।’

पीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता इस बारे में सुझाव दे सकते हैं कि समलैंगिक जोड़े किन अड़चनों का सामना कर रहे हैं। फिलहाल, इस मुद्दे पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी है।अब नौ मई को इस पर फिर से सुनवाई होगी। 
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