हाल ही में हुए उपचुनावों में भाजपा को कुछ राज्यों में मिली करारी हार की वजह को टटोला ही जा रहा था कि उसे बैठे-बिठाए विपक्ष ने ऐसा मुद्दा दे दिया. जिसे भाजपा ने हाथोंहाथ लपक लिया है। इसमें समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव का 'जिन्ना' को लेकर दिया गया बयान भी शामिल है, और कांग्रेस नेता राशिद अल्वी के राम और राक्षसों वाले बयान से लेकर सलमान खुर्शीद की किताब के विवादित अंश और राहुल गांधी का हिंदुत्व की परिभाषा के साथ शिव की व्याख्या शामिल है।
मुद्दा सिर्फ समाजवादी पार्टी के मुखिया अखिलेश यादव ने नहीं दिया। ऐसे मौके पर कभी भारतीय जनता पार्टी के साथ खड़े रहने वाले और अब अखिलेश यादव के साथ चुनावी करार करने वाले सुहेलदेव समाज पार्टी के मुखिया ओमप्रकाश राजभर ने तो यह तक कह दिया कि जिन्ना अगर आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री होते तो देश का बंटवारा ही नहीं होता। बस फिर क्या था। भाजपा ने राजभर के बहाने सपा को भी अपनी चुनावी रैलियों में देशभक्ति और हिंदुत्व के नाम पर भारत-पाकिस्तान का मुद्दा उठाकर कटघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।
चुनाव नजदीक आते ही कांग्रेस के नेता भी कुछ न कुछ ऐसा बोल ही जाते हैं, जिसे भाजपा हिंदू-मुस्लिम और भारत-पाकिस्तान के साथ जोड़ देती है। हाल में कांग्रेस के नेता राशिद अल्वी ने अपने संबोधन में राम और राक्षसों की तुलना करने जैसा एक बयान दे दिया। बस फिर क्या था भारतीय जनता पार्टी को एक और मुद्दा मिल गया। राशिद अल्वी के बयान को लेकर भारतीय जनता पार्टी अपने उन सभी राज्यों में कांग्रेस को हिंदुओं और राम का विरोधी बताकर प्रचारित-प्रसारित करने लगी। कांग्रेस के लिए यही स्थिति थोड़ी असहज जरूर हुई और पार्टी इसका डैमेज कंट्रोल करने की कोशिश कर ही रही थी कि सलमान खुर्शीद की नई किताब सामने आ गई।
दिल्ली विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र के प्रवक्ता प्रोफ़ेसर जसविंदर सोढ़ी कहते हैं कि हकीकत में चुनाव में मुद्दा महंगाई से लेकर बढ़ती हुई पेट्रोल-डीजल की कीमतें और किसानों का आंदोलन है। वे कहते हैं कि लोगों के बीच में इन दोनों मामलों की चर्चा भी खूब हो रही है। विपक्ष बी सत्तापक्ष को इन्हीं मामलों में घेरने और बचाव करने की अपनी रणनीतियां भी बना रहा है, लेकिन कई बार विपक्षी पार्टियों के नेताओं के ऐसे बयान सामने आते हैं जो असली मुद्दों को भटका देते हैं। प्रोफेसर जसविंदर के मुताबिक निश्चित तौर पर अगर पब्लिक से जुड़े हुए मुद्दे चुनाव में शामिल किए जाएं तो सरकारों के बदलने में कोई देर नहीं लगती। वे कहते हैं कि दिल्ली में शीला दीक्षित की सरकार बढ़ी हुई कीमतों की वजह से चली गई थी। तो ऐसा नहीं है कि विपक्षी पार्टियां महंगाई और जरूरत के मुद्दों को दरकिनार करना चाहती हैं, लेकिन गाहे-बगाहे उनके बयान सत्तापक्ष को वह बहुत बड़ा हथियार दे देते हैं, जिससे असली मुद्दे छुप जाते हैं।