दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज के द्वारा छह सितंबर को जारी एक सूचना में कहा गया था कि असिस्टेंट प्रोफेसरों के वेतन में 30 हजार और एसोसिएट प्रोफेसरों के वेतन में 50 हजार रूपये तक की कटौती की जा रही है। शिक्षकों को बताया गया था कि कॉलेज के पास फंड आने के बाद इस बकाए का भुगतान कर दिया जाएगा, लेकिन यह कब तक किया जाएगा, इस पर कोई सूचना नहीं दी गई थी। इस कटौती का कारण कॉलेज के पास पर्याप्त फंड न होना बताया गया था। लेकिन यह सूचना सामने आते ही बवाल मच गया और शिक्षक कॉलेज के इस निर्णय के विरोध में उतर आए।
पूछा गया सवाल
दीन दयाल उपाध्याय कॉलेज के अधिकारियों ने शिक्षकों के वेतन में कटौती को अनावश्यक उठाया गया कदम बताया था। अधिकारियों का कहना था कि कॉलेज की गवर्निंग बॉडी की अनुमति के बिना शिक्षकों के वेतन में कोई कटौती कैसे की गई, प्रिंसिपल से इसके बारे में पूछताछ की गई। यह भी बताया गया कि कॉलेज के पास 25 करोड़ रूपये का धन शेष है, ऐसे में वह शिक्षकों का वेतन कैसे काट सकता है।
क्या है असली विवाद
दरअसल, दिल्ली यूनिवर्सिटी के अंतर्गत आने वाले राजधानी के 28 कॉलेजों की फंडिंग दिल्ली सरकार के माध्यम से की जाती है। इसमें दिल्ली सरकार 16 कॉलेज में केवल पांच प्रतिशत और बाकी के 12 कॉलेज में 100 प्रतिशत फंड देती है। असली झगड़ा इन कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी पर राजनीतिक कब्जे को लेकर है जिसके लिए भाजपा और आम आदमी पार्टी के विचारधारा से जुड़े लोग सक्रिय रहते हैं।
प्रत्येक कॉलेज की गवर्निंग बॉडी में लगभग 15 सदस्य होते हैं। इसमें पांच सदस्य दिल्ली सरकार नामित करती है जबकि पांच सदस्य दिल्ली सरकार द्वारा उस पैनल में से चुने जाते हैं जिसे दिल्ली यूनिवर्सिटी दिल्ली सरकार को भेजती है। दो सदस्य दिल्ली यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर, दो सदस्य उसी कॉलेज के सीनियर और जूनियर प्रोफेसर, और एक सदस्य उस कॉलेज का प्रिंसिपल होता है जो इस गवर्निंग बॉडी का सचिव भी होता है।
दिल्ली में जिस राजनीतिक दल की सत्ता होती है, वह इन कॉलेजों की गवर्निंग बॉडी पर कब्जा कर कॉलेज को अपने हिसाब से चलाना चाहता है। इससे उसके पास कुछ नियुक्तियों को करने के साथ-साथ कॉलेज के फंड को अपने हिसाब से खर्च करने का अधिकार मिल जाता है। इस वक्त बार दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, और केंद्र में भाजपा की सरकार होने के साथ-साथ दिल्ली के उपराज्यपाल से उसकी लगातार खींचतान जारी है, ऐसे में कयास लगाए जा रहे हैं कि उसका असर दिल्ली के इन कॉलेजों पर भी पड़ रहा है।
शिक्षकों ने की ये मांग
दिल्ली यूनिवर्सिटी के ईसी कमेटी के सदस्य राजेश झा ने अमर उजाला से कहा कि शिक्षकों के वेतन में कटौती अस्वीकार्य है। पूरा शिक्षक समुदाय कॉलेज के इस कदम की आलोचना करता है और कॉलेज प्रशासन से मांग करता है कि शिक्षकों का वेतन अविलंब जारी किया जाए। उन्होंने कहा कि शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक लड़ाई से दूर रखा जाना चाहिए और दिल्ली सरकार को भी इन कॉलेजों का फंड तत्काल जारी करना चाहिए, जिससे वे अपने शिक्षकों का वेतन समय से दे सकें। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय से भी एक निष्पक्ष अंपायर की तरह भूमिका का निर्वाह करते हुए इस विवाद का स्थाई समाधान तलाशने के लिए उचित प्रयास किए जाने की आवश्यकता बताई।