पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस वाई कुरैशी अपनी नई किताब 'इंडियाज एक्सपेरिमेंट विद डेमोक्रेसी: द लाइफ ऑफ ए नेशन थ्रू इट्स इलेक्शन' को लेकर सुर्खियों में हैं। एक सक्षात्कार में बातचीत के दौरान उन्होंने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति विधेयक को लेकर खुलकर बात की है। उन्होंने कहा, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर विधेयक में कई सकारात्मक विशेषताएं हैं। उन्होंने चयन पैनल के पैटर्न पर अपनी चिन्ता व्यक्त की है।
वहीं चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर खुलकर बोलते हुए उन्होंने कहा, चुनाव आयुक्त के लिए कोई योग्यता तय नहीं है। किसी को भी इस पद पर बैठाया जा सकता है। उन्होंने कहा, नए विधेयक में एक शॉर्टलिस्टिंग कमेटी की बात की गई है। देखने की जरूरत तो यह है कि इस पद को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों से घटाकर कैबिनेट सचिव का कर दिया गया है, जो कि उचित बात नहीं है। भारत के चुनाव आयोग की विश्व में एक अलग छवि है। पिछले 10 सालों में हमने 108 देशों के आयुक्तों को प्रशिक्षित किया है।
बता दें कि विपक्ष के हंगामे के बीच सरकार ने अगस्त माह में राज्यसभा में एक विधेयक पेश किया था। जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के चयन के लिए पैनल में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह एक कैबिनेट मंत्री को शामिल करने का प्रावधान है। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (सेवा की नियुक्ति शर्तें और कार्यालय की अवधि) विधेयक, 2023 को उच्च सदन में पेश किया,जहां यह लंबित है।
विधेयक में क्या है खास?
विधेयक के मुताबिक भविष्य के मुख्य चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयुक्तों का चयन प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पैनल द्वारा किया जाएगा, जिसमें लोकसभा में विपक्ष के नेता और एक कैबिनेट मंत्री शामिल होंगे। कांग्रेस और आप सहित विपक्षी दलों ने विधेयक पर कड़ी आपत्ति जताई है और सरकार पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश को कमजोर करने का आरोप लगाया है।
यह विधेयक मार्च में सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के कुछ महीने बाद आया है। जिसमें कहा गया था कि चयन पैनल में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) शामिल होने चाहिए, जब तक कि नियुक्ति पर संसद द्वारा कानून नहीं बनाया जाता है। विधेयक के मुताबिक, मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों का वेतन और भत्ते कैबिनेट सचिव के बराबर होंगे।