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संन्यासियों का संगठन नहीं है आरएसएस, यहां महिला-पुरुष सभी के लिए समान जगह है

Tue, 18 Sep 2018 12:34 AM IST
जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली 
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संगठन (आरएसएस) के सरसंघचालक मोहन भागवत का कहना है कि आरएसएस कोई संन्यासियों का संगठन नहीं है। इसमें पुरुष और स्त्री की समान भूमिका है। यहां महिलाओं को भी बराबर की जिम्मेदारी मिलती है।

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भागवत ने बीते दिनों कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा दिए गए बयान कि आरएसएस महिला विरोधी संगठन है, महिलाओं को इसमें प्रवेश नहीं करने दिया जाता, का अप्रत्यक्ष तौर से जवाब देते हुए कहा, बहुत से लोगों को मालूम नहीं है कि आरएसएस की एक महिला इकाई, जिसे राष्ट्रीय स्वयं सेविका कहा जाता है, इसमें महिलाओं की ही भागेदारी होती है।

आरएसएस में पराया कोई नहीं है। सरसंघचालक सोमवार को विज्ञान भवन में आयोजित तीन दिवसीय ‘भविष्य का भारत: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दृष्टिकोण, व्याख्यानमाला के पहले दिन बोल रहे थे।
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जो हमारा विरोध करते हैं, वे भी हमारे हैं, हमें क्षति न हो, केवल इतना ध्यान रखते हैं

मोहन भागवत ने आरएसएस की आलोचना करने वालों को करारा जवाब देते हुए कहा, जो हमारा विरोध करते हैं, वे भी हमारे हैं। हम केवल इतना ध्यान रखते हैं, कि वे हमें क्षति न पहुंचा सकें। विरोध गलत नहीं है, अपितु यह वस्तुस्थिति के मुताबिक होना चाहिए।

आरएसएस को बताया सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संगठन

सरसंघचालक ने उन विरोधियों को करारा जवाब दिया है, जो आरएसएस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहते रहते हैं कि यह संगठन तो अलोकतांत्रिक है। इसमें तानाशाही का पुट बना रहता है। उन्होंने कहा, आरएसएस आज दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक संगठन है। इसमें सभी लोगों को अपनी बात कहने का अधिकार है। हम संघ का वर्चस्व नहीं चाहते, अगर ऐसा हुआ तो यह संघ की पराजय होगी। हमारे संगठन में कदम-कदम पर सामूहिकता है।

साईंबाबा पहले कहां थे, 33 करोड़ देवी-देवता हैं, फिर भी नए-नए आते रहते हैं....

किसी भी समाज के भले के लिए व्यक्ति और व्यवस्था दोनों का अच्छा होना जरूरी है। समाज का दबाव व्यवस्था को बदल देता है, इस विषय पर भागवत ने कहा, भारत की धरती अनेकता से भरी है, लेकिन फिर भी कुछ है जो समाज को बांधे रखती है। अब देवी-देवताओं को ही देख लो।

33 करोड़ तो पहले ही हैं, फिर भी नए-नए देवता आते रहते हैं। साईंबाबा पहले कहां थे, मगर वे भी देवताओं में शामिल हो गए। अगर इस्लाम और ईसाइयत में भारतीयता है तो वे समाज और राष्ट्र को जोड़ने वाली हैं। कोई भी मनुष्य या समाज जब अपने मूल्यों को भूलकर आचरण शुरू कर देता है तो उसका पतन आरंभ हो जाता है। उन्होंने कहा, हिंदुत्व सभी को जोड़ता है।

जब आरएसएस कार्यकर्ता ने बीच में फंसे कांग्रेस के ध्वज को उपर पहुंचाया था... 

मोहन भागवत ने आरएसएस को सबका बताते हुए आजादी से पहले का एक उदाहरण दिया। उन्होंने कहा, हम तिरंगे का सम्मान करते हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आरएसएस का ध्वज अलग है। आजादी से पहले एक सभा में पंडित नेहरू को तिरंगा फहराना था। उस वक्त तिरंगे में केवल चरखा होता था, चक्र नहीं था।

जब झंडा फहराने के लिए उसे उपर की तरफ खींचा जाने लगा तो वह बीच में अटक गया। सब एक दूसरे की ओर देखने लगे कि अब इसे कौन ठीक करेगा। तभी भीड़ में एक आरएसएस कार्यकर्ता उठा और उसने पोल पर चढ़कर झंडे को ठीक कर दिया। नेहरू बहुत खुश हुए। उन्होंने युवक की पीठ थपथपाई और कहा, शाम को सभा में आना। तभी किसी ने नेहरू के कान में कहा, यह युवक शाखा में जाता है, इसे मत बुलाओ। हालांकि इसके बावजूद उस युवक को प्रोत्साहन के तौर पर चांदी का लोटा दिया गया था।
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आज जगह-जगह पर नायकों की जरूरत है

आरएसएस सरसंघचालक ने कहा, देश में आज किसी एक नायक की नहीं, बल्कि जगह जगह पर नायकों की जरूरत है। समाज का गुणवत्तापूर्वक चित्रण न तो आजादी से पहले हो सका था और न ही आजादी के बाद हो सका है।

आज ऐसे नायकों की जरूरत है जो लोगों में गुणवत्तापूर्वक सोच पैदा कर सकें। स्व. राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम ने एक बार कहा था कि अगर स्वयं के प्रति या देश के प्रति विश्वास जागृत करना है तो इसके लिए प्राचीन संस्कृति में जाना होगा। हमारा लक्ष्य है कि हर गली मुहल्ले में अच्छे स्वयंसेवक खड़े हों। देश भक्तों की एक टोली हर गली में रहे। भागवत ने कहा, संघ तो इतना ही चाहता है, इससे ज्यादा कुछ नहीं।

मंत्रियों एवं दूसरे विशिष्ट जनों को संघ का प्रोटोकॉल समझने में देर लगी....

केंद्रीय मंत्रियों के अलावा, पूर्व न्यायाधीश, राजदूत, उद्योगपति एवं दूसरे क्षेत्रों के विशेषज्ञ विज्ञान भवन में पहुंचे थे। हालांकि सभी लोगों को उनकी तय सीट तक पहुंचाने के लिए आरएसएस कार्यकर्ता अपनी ड्यूटी में जुटे हुए थे, लेकिन मंत्रियों को संघ का प्रोटोकॉल समझने में देर लगी। सबसे पहले राजनेता अमर सिंह आयोजन स्थल पर पहुंच गए। वे मंच के ठीक सामने की पहली पंक्ति में जाकर बैठ गए।

हालांकि उनके सामने आरक्षित सीट का बोर्ड लगा था, लेकिन इसके बावजूद वे वहीं पर बैठे रहे। कार्यक्रम शुरू होने से पहले जब कार्यकर्ताओं ने उन्हें उठाया तो उन्हें संघ का प्रोटोकॉल समझ में आ गया। अमर सिंह चुपके से चौथी लाइन में कहीं बीच की सीट पर जाकर बैठ गए। इसके बाद केंद्रीय मंत्री थावर सिंह का नंबर आया। वे पहले से ही तीसरी पंक्ति में बैठे हुए थे। मंत्री को भी वहां से उठना पड़ा।

उन्हें पांचवीं पंक्ति में जगह मिली। इसी तरह लोकसभा सांसद मनोज तिवारी भी मंच के आसपास घूमते नजर आए।सांसद प्रवेश वर्मा भी छठी पंक्ति में बैठे हुए थे।कार्यक्रम के बीच में पहुंचे सांसद उदित राज को तो बड़ी मशक्कत से आठवीं पंक्ति में कौने की सीट मिली।

केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह भी कार्यक्रम के बीच में पहुंचे। वे एग्जिट द्वार के साथ खड़े हो गए। उन्हें एक कार्यकर्ता ने अपनी सीट दी।मंत्री जी का मन नहीं लगा और वे दस मिनट बाद ही चुपके से निकल गए।
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