राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने सोमवार को संस्कृत सीखने के महत्व पर जोर दिया। उन्होंने इसे भारत की आत्मा और देश की सभ्यतागत निरंतरता के लिए जरूरी तत्व बताया। वे दिल्ली में संस्कृत भारती के केंद्रीय कार्यालय के उद्घाटन समारोह में बोल रहे थे। संस्कृत भारती एक ऐसी संस्था है जो संस्कृत को एक जीवंत और व्यापक रूप से प्रयुक्त भाषा के रूप में बढ़ावा देने के लिए समर्पित है। इस कार्यक्रम में संस्कृत को आधुनिक संचार माध्यम के रूप में उपयोग करने के लिए चल रहे प्रयासों पर प्रकाश डाला गया।
संस्कृत राष्ट्र की आत्मा है-आरएसएस प्रमुख
सभा को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा,' संस्कृत एक भाषा है। फिर भी, यह मात्र एक भाषा नहीं है। भारत में, संस्कृत राष्ट्र की आत्मा है क्योंकि यह विचार, जीवन और संस्कृति की सबसे प्राचीन परंपरा है - एक ऐसी परंपरा जो आज भी जीवंत है - जो भारत में विद्यमान है।' उन्होंने भारत के दार्शनिक विचार को और विस्तार से समझाते हुए कहा,' भारत का अस्तित्व मात्र एक भौगोलिक तथ्य नहीं है। यह महज एक राजनीतिक या आर्थिक इकाई नहीं है। भारत एक जीवंत परंपरा है-वह आधारशिला जिस पर जीवन की निरंतरता टिकी हुई है।'
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उन्होंने आगे कहा कि पिछले 15 वर्षों में संस्कृत के प्रति सामाजिक दृष्टिकोण में आया परिवर्तनकारी बदलाव साफ रूप से दिखाई दे रहा है। उन्होंने पाया कि बदलती परिस्थितियां लोगों को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से फिर से जुड़ने के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। ऐसे संदर्भ में, संस्कृत सीखने और समझने के अवसर प्रदान करना एक महत्वपूर्ण मिशन बन जाता है। भागवत ने सभा को संबोधित करते हुए कहा नए कार्यालय का निर्माण निःसंदेह खुशी और उत्साह का स्रोत है; हालांकि, हमें यह समझना होगा कि कार्यालय स्वयं कार्य का कारण नहीं है, बल्कि कार्य के विस्तार का परिणाम है।