दवाओं की अधिक कीमत वसूलने के मामलों में 31 मार्च 2026 तक केंद्र सरकार ने कंपनियों पर 10,029 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया, लेकिन केवल 1,582.4 करोड़ रुपये ही वसूल सकी। करीब 84 फीसदी रकम अब भी बकाया है। सिप्ला समेत कई बड़ी कंपनियों के मामले अदालतों और सरकारी प्रक्रियाओं में फंसे हैं।
अस्पताल में इलाज कराने पहुंचा मरीज दवा की कीमत को लेकर भी लूट रहा है। हाल के दिनों में उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में दवाओं की खरीद कीमत से कई गुना ज्यादा कीमत मरीजों से वसूलने के मामले सामने आए हैं। उत्तर प्रदेश में जांच के दौरान कुछ दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत अस्पताल की खरीद कीमत से 67 गुना तक ज्यादा मिली। कर्नाटक में भी कुछ दवाओं की कीमत खरीद कीमत से 52 गुना तक ज्यादा मिलने का मामला सामने आया है। लेकिन दवाओं पर ज्यादा कीमत वसूलने का यह खेल नया नहीं है।
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केंद्र सरकार के औषधि मूल्य निर्धारण प्राधिकरण (एनपीपीए) के आंकड़े बताते हैं कि 31 मार्च 2026 तक दवा कंपनियों से ज्यादा वसूली के मामलों में 10 हजार 29 करोड़ रुपये जुर्माना लगाया गया। इसमें से केवल 1,582.4 करोड़ रुपये ही वसूले जा सके हैं। यानी करीब 84 फीसदी यानी 8,447.4 करोड़ रुपये अब भी बाकी हैं। सबसे बड़ी परेशानी यह है कि कार्रवाई होने के बाद कंपनियां कई मामलों को अदालत में चुनौती दे देती हैं। इसके चलते सरकार की ओर से तय की गई बड़ी रकम वर्षों तक वसूली में अटकी रहती है। आंकड़ों के मुताबिक 5,872.6 करोड़ रुपये की रकम ऐसे मामलों में फंसी है, जिन्हें कंपनियों ने अदालत में चुनौती दी है या जो वसूली अधिकारी के स्तर पर विवादित हैं।
5,872 करोड़ अदालत में, 2,369 करोड़ प्रक्रिया में
बकाया रकम में सबसे बड़ा हिस्सा मुकदमेबाजी में फंसा है। करीब 5,872.6 करोड़ रुपये ऐसे मामलों में हैं जिन्हें कंपनियों ने चुनौती दी है या जो वसूली की कानूनी प्रक्रिया में विवादित हैं। इसके अलावा 2,369.3 करोड़ रुपये ज्यादा वसूली के मामलों की प्रक्रिया में लंबित हैं। करीब 200 करोड़ रुपये वसूली अधिकारी के पास और 5.5 करोड़ रुपये बीआईएफआर या आधिकारिक परिसमापक के पास अटके हैं। यानी मरीज से ज्यादा रकम वसूले जाने के बाद सरकार की कार्रवाई के बावजूद हजारों करोड़ रुपये लंबे समय तक सरकारी खाते में वापस नहीं आ पा रहे हैं।
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बड़े मामलों में सिप्ला समेत कई कंपनियां
कंपनीवार रिकॉर्ड में सिप्ला, जॉनसन एंड जॉनसन, रैनबैक्सी, ग्लैक्सोस्मिथक्लाइन और सन फार्मा जैसी कंपनियों के खिलाफ बड़ी रकम के मामले दर्ज हैं। सिप्ला के एक सालबुटामोल मामले में ब्याज समेत 742.82 करोड़ रुपये की जुर्माना दर्ज है, जिसमें 93.96 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं। करीब 648.85 करोड़ रुपये बाकी हैं और मामला मुकदमेबाजी में है। सरकारी रिकॉर्ड में सबसे पुराने मामले 1979 के औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश से जुड़े हैं। एक पुराने सैंडोज इंडिया मामले में ब्याज समेत करीब 1.37 करोड़ रुपये की मांग दर्ज है और मामला अब भी मुकदमेबाजी में है।
जनवरी-मार्च 2026 में प्रमुख मामले
सिप्ला-क्रेसार 40 मिलीग्राम : 1.90 करोड़ रुपये
माइक्रो लैब्स-अवास 10 मिलीग्राम : 1.58 करोड़ रुपये
मेडिस्प्रे लैबोरेटरीज-एडवेंट : 39.61 लाख रुपये
हेगड़े एंड हेगड़े-मूपी मरहम : 25.83 लाख रुपये
रिलायंस फॉर्मुलेशंस-क्लोनापैक्स एमडी : 24.34 लाख रुपये
मर्करी लैबोरेटरीज-टी स्टैट इंजेक्शन : 18.47 लाख रुपये
एफडीसी-जोकॉन टैबलेट : 14.34 लाख रुपये
नोट : अक्तूबर 2025 से मार्च 2026 के बीच भी औषधि मूल्य नियंत्रण आदेश 2013 के तहत 12.81 करोड़ रुपये की वसूली हुई।