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अलीगढ़ में बढ़ी रोहिंग्या की तादाद, खुफिया एजेंसियों ने शुरू की पड़ताल

Wed, 01 Aug 2018 06:10 AM IST
अभिषेक शर्मा, अमर उजाला, अलीगढ़
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अलीगढ़ में रोहिंग्याओं को लेकर खुफिया आंकड़ों के अनुसार 250 रोहिंग्या वर्क परमिट या शरणार्थी के रूप में रह रहे हैं। मगर मौके पर इनकी संख्या 500 से भी ज्यादा देखी जा रही है। वहीं रोहिंग्या दावा कर रहे हैं कि उनके बीच काफी संख्या में बंग्लादेशी भी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं। ऐसे में केंद्रीय व स्थानीय खुफिया एजेंसियों मामले पर सतर्क नजर रख रही है। मुद्दा सुर्खियों में आने के बाद सुबह से ही केंद्रीय व स्थानीय खुफिया एजेंसियों ने स्थानीय अपडेट लेना शुरू कर दिया है।

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नए सिरे से शरणार्थियों के रिकॉर्ड और उनके कार्ड का सत्यापन शुरू किया जा रहा है। मंगलवार को भी टीमों ने इनसे संबंधित इलाकों में घूमकर अपडेट लिया कि कौन नया आया है और कौन यहां से गया है। अगर गया है तो क्यों गया है। एसएसपी ने कहा है कि सत्यापन का काम कराया जा रहा है।  वहीं सीओ एलआईयू सतीश चंद्र पांडेय के अनुसार रिकॉर्ड में 245 शरणार्थी दर्ज हैं। बाकी नए सिरे से सत्यापन का काम कराया जा रहा है।

मकदूम नगर में बसे है 300 से 400 लोग
अलीगढ़ में 2010-12 के आसपास मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री में आए उछाल के बाद शहर में रोहिंग्या परिवारों का आना शुरू हुआ था। धीरे-धीरे मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री के हब कहे जाने वाले मकदूम नगर में इन्हें ठिकाना मिलने लगा और स्थानीय लोगों ने इन्हें अपने घरों में किराये पर रखना शुरू कर दिया। अब तक मकदूम नगर में तकरीबन 300 से 400 लोग बस गए।
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इसी तरह करीब एक-एक दर्जन परिवार भुजपुरा व शाहजमाल में भी हैं और इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। रोहिंग्याओं के अगुवा मो. बिलाल के अनुसार वर्तमान में 80 से 85 परिवारों में 400 से 500 लोग यहां हैं, जिनमें 300 बालिग रोहिंग्या शरणार्थी कार्ड या वर्क परमिट के सहारे हैं। बाकी 100 या उससे अधिक नाबालिग व बच्चे हैं, जिनका कार्ड नहीं होगा। 

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रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक 

रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक 
मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अनुसार पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है।

इसी वजह से इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं। यही वजह है कि म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे हजारों रोहिंग्या परिवारों का एक बड़ा धड़ा अलीगढ़ की मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की धुरी बना हुआ है। 

मदरसे में पढ़ते हैं 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे 
मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे रोहिंग्याओं का शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। वे लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्ट्री मालिकान व प्रबंधक की रहती है।

जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं। यही वजह है कि मकदूम नगर में इलाके के पूर्व पार्षद शहजाद अल्वी ने अपनी खाली पड़ी जमीन रोहिंग्या परिवारों के बच्चों के लिए दे दी है, जिस पर रोहिंग्या मो. हाफिज सैफ (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं। वह  कहते हैं कि वह जहन्नुम से निकलकर आए हैं और भारत उन्हें जन्नत की तरह लग रहा है। फिर यहां से जाने की क्यों सोचें।

 अलीगढ़ शहर में करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी हैं। उनका पूरा रिकॉर्ड हमारे पास है। अब उनके शरणार्थी कार्ड नए सिरे से सत्यापित कराए जाएंगे। उनकी समयावधि, गतिविधि और आने-जाने की तारीखों आदि का रिकॉर्ड नए सिरे से अपडेट किया जाएगा। उनके बीच अगर बांग्लादेशी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं, तो इसकी जांच की जाएगी।
अजय कुमार साहनी, एसएसपी
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