रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक
मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री से जुड़े लोगों के अनुसार पश्चिमी देशों में रोहिंग्या कटिंग मीट की डिमांड सबसे अधिक रहती है। इसलिए मीट इंडस्ट्री में इन कर्मचारियों की मांग भी अधिक रहती है।
इसी वजह से इन्हें आसानी से यहां की फैक्ट्रियों में रोजगार मिल जाता है। मकदूम नगर में रह रहे कुछ लोगों ने टिर्री और जुगाड़ वाहन भी बना रखे हैं। उनमें मजदूरी पर माल ढुलाई का काम करते हैं। यही वजह है कि म्यांमार से भागकर भारत पहुंचे हजारों रोहिंग्या परिवारों का एक बड़ा धड़ा अलीगढ़ की मीट एक्सपोर्ट इंडस्ट्री की धुरी बना हुआ है।
मदरसे में पढ़ते हैं 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे
मीट फैक्ट्रियों में काम कर रहे रोहिंग्याओं का शहर के अन्य हिस्से से कोई नाता नहीं रहता। वे लोग मीट फैक्ट्रियों के अंदर या आसपास रहते हैं। उनके हर इंतजाम की जिम्मेदारी फैक्ट्री मालिकान व प्रबंधक की रहती है।
जो उनसे अलग बस्तियों में रह रहे हैं। यही वजह है कि मकदूम नगर में इलाके के पूर्व पार्षद शहजाद अल्वी ने अपनी खाली पड़ी जमीन रोहिंग्या परिवारों के बच्चों के लिए दे दी है, जिस पर रोहिंग्या मो. हाफिज सैफ (आलिम-मदरसे में पढ़ाने वाले) मदरसा चलाते हैं और इनके मदरसे में 60 के करीब रोहिंग्या बच्चे पढ़ते हैं। वह कहते हैं कि वह जहन्नुम से निकलकर आए हैं और भारत उन्हें जन्नत की तरह लग रहा है। फिर यहां से जाने की क्यों सोचें।
अलीगढ़ शहर में करीब 250 रोहिंग्या शरणार्थी हैं। उनका पूरा रिकॉर्ड हमारे पास है। अब उनके शरणार्थी कार्ड नए सिरे से सत्यापित कराए जाएंगे। उनकी समयावधि, गतिविधि और आने-जाने की तारीखों आदि का रिकॉर्ड नए सिरे से अपडेट किया जाएगा। उनके बीच अगर बांग्लादेशी रोहिंग्या बनकर रह रहे हैं, तो इसकी जांच की जाएगी।
अजय कुमार साहनी, एसएसपी