जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया और बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने 1980 से लगातार तीन साल तक यहां की वनस्पतियों और पारिस्थितिकी का अध्ययन किया। जर्मनी के वन्यजीव विज्ञानी वीके स्वेल ने भी यहां आकर गैंडा पुनर्वासन की संभावनाओं पर शोध किया। वैज्ञानिकों ने पाया कि दुधवा नेशनल पार्क की वानस्पतिक विविधता असम के काजीरंगा और मानस नेशनल पार्क के समान है।
यहां घास प्रजाति की 10, शाकीय और आरोही प्रजाति की 10 और जलीय प्रजाति की छह ऐसी प्रजातियां बहुतायत से मिलती हैं जिन्हें गैंडा बेहद चाव से खाते हैं। यहां के वेटलैंड और ग्रास लैंड पर भी शोध किया गया और यह गैंडों के अनुकूल पाए गए।
लंबे शोध और अध्ययन के बाद वर्ष 1984 में आसाम के काजीरंगा नेशनल पार्क से दो नर और तीन मादा गैंडों को दुधवा लाकर सोनारीपुर रेंज के ककरहा क्षेत्र में गैंडा पुनर्वासन योजना शुरू की गई। इसके बाद 1985 में नेपाल से चार मादा गैंडा लाकर असम के साथ गैंडों को रखा गया। अब इनकी संख्या बढ़कर 35 हो गई है।
गैंडों की बढ़ती आबादी के लिहाज से 27 वर्ग किलोमीटर का क्षेत्रफल इनके लिए कम पड़ने लगा है। साथ ही इनब्रीडिंग से आनुवंशिक दोष का खतरा मंडराने लगा तो इसी साल अप्रैल माह में दुधवा के बेलरायां रेंज के भादीताल में एक नर गैंडा नेपालियन और तीन मादा गैंडों सुभद्रा, शमा और श्रीदेवी के साथ गैंडा पुनर्वासन योजना फेज-2 शुरू की गई है। यह भी कामयाबी की ओर बढ़ रही है।