भारत में अस्सी के दशक की आया राम-गया राम की सियासत ने बिल्कुल नया मुकाम हासिल कर लिया है। अबके बागी विधायक और सांसद खुद शानदार रिसॉर्ट्स में ठंडी हवा खा रहे हैं और सियासी गर्मी बाहर उड़ेलकर विरोधी खेमों को झुलसा रहे हैं। महाराष्ट्र में सरकार गिराने का प्रयास हो या हाल के राज्यसभा चुनावों के दौरान विधायकों को एक साथ रखने के लिए लग्जरी होटल या रिसॉर्ट में ले जाना, इस नए चलन में जिस पार्टी के हाथ में इन विधायकों की बागडोर होती है, वह इन होटल या रिसॉर्ट को अभेद्य किले में बदल देती है।
एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में शिवसेना विधायकों के एक असंतुष्ट समूह के सूरत के एक होटल से गुवाहाटी के रेडिसन ब्लू होटल में पड़ाव के साथ रिसॉर्ट राजनीति एक बार फिर से हर जुबान पर छायी है। यहां एकजुट होकर बागियों ने महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली शिवसेना और एमवीए सरकार को संकट में डाल दिया है। कई मौकों पर रिसॉर्ट राजनीति ने बागियों को फायदा पहुंचाया है, लेकिन कुछ प्रयासों में असफलता भी उनके हाथ लगी है।
लोकतंत्र का ‘बदसूरत’ तमाशा
वर्ष 1982 का देवीलाल-भाजपा गठबंधन विधायकों को उस होटल से भागने से रोकने में विफल रहा, जहां उन्हें रखा गया था। कांग्रेस नेता सचिन पायलट हाल में अशोक गहलोत के नेतृत्व वाली सरकार को गिराने में सफल नहीं हो सके। रिसॉर्ट राजनीति ने नैतिकता पर भी सवाल उठाए हैं। लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य इसे लोकतंत्र का सबसे ‘बदसूरत’ तमाशा मानते हैं।
वह कहते हैं, यह प्रथा अन्य लोकतंत्रों तक नहीं पहुंचनी चाहिए। उन्होंने मीडिया पर रिसॉर्ट राजनीति की ‘कुरूपता’ को उजागर करने के बजाय सनसनीखेज बनाने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, यह हमारी प्रणाली की कमजोरी को दर्शाता है। हमारे लोकतंत्र के अनैतिक और चरित्रहीन पहलू को सामने लाता है, जो यह पतन का संकेत है।