रविंद्र कोल्हे नागपुर मेडिकल कालेज से एमबीबीएस कर रहे थे। शेगांव में हर कोई रविंद्र की पढ़ाई खत्म होने का इंतजार कर रहा था। वजह, रविंद्र अपने खानदान के पहले डॉक्टर जो बनने वाले थे। परिजनों में जश्न जैसा माहौल था। पर, ये कौन जानता था, अपना डॉक्टर पैसे के पीछे भागने की बजाए एक अलग ही राह चुनेगा। हुआ भी कुछ ऐसा ही। पत्नी भी उनकी सोच वाली मिल गई। डॉक्टर दंपति ने दुनिया के तमाम ऐशो-आराम छोड़कर महाराष्ट्र के अति पिछड़े कहे जाने वाले मेलघाट क्षेत्र के गांव बैरागढ़ को अपने जीने का मकसद बना लिया।
एक ऐसा गांव जहां पर बुनियादी सुविधाएं न के बराबर थी। बिजली का तो नाम ही नहीं था। अस्सी के दशक में स्वास्थ्य सेवाएं ऐसी थीं कि मरीज बीच राह में दम तोड़ दे। मतलब, निकटवर्ती अस्पताल हरिसाल (छोटा सा कस्बा) में था, जो बैरागढ़ से 40 किलोमीटर दूर था। खास बात, वहां तक पैदल ही जाना पड़ता था।
डॉ. रविंद्र और डॉ. स्मिता कोल्हे ने मेलघाट के लोगों की जिंदगी बदल दी। इस दंपति ने इलाके की स्वास्थ्य सुविधाओं को एक नया आयाम दे दिया। इतना ही नहीं, लोगों को बिजली, सड़क और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी उपलब्ध कराए हैं। गणतंत्र दिवस पर इस दंपति को पद्मश्री देने की घोषणा की गई।
डेविड वर्नर की पुस्तक के पहले पन्ने पर छपी तस्वीर ने जीवन का मकसद तय कर दिया
डॉ. कोल्हे ने जीवन का मतलब समझने के लिए महात्मा गांधी और विनोबा भावे की कई पुस्तकें पढ़ी थीं। इससे उनकी जीवन के प्रति सोच ही बदल गई। डॉ. कोल्हे ने तय किया कि वे डॉक्टरी की पढ़ाई का इस्तेमाल पैसे कमाने के लिए नहीं करेंगे, बल्कि जरूरतमंदों की मदद के लिए करेंगे। अब उनके सामने बस एक ही सवाल था कि शुरूआत कहां से की जाए। डॉ. कोल्हे ने डेविड वर्नर की पुस्तक के पहले पन्ने पर चार लोगों की तस्वीर देखी।
इसमें चार आदमी एक मरीज को अपने कंधे पर उठाये चले जा रहे थे। बस फिर क्या था, डॉ. कोल्हे को अपनी राह मिल गई। उन्होंने तय कर लिया कि वे अपनी सेवाएं ऐसी जगह पर देंगे, जहां दूर-दूर तक कोई स्वास्थ्य सुविधा नहीं है। इसके लिए उन्होंने बैरागढ़ का चयन किया। यह महराष्ट्र के मेलघाट में पड़ता है। मेलघाट की यात्रा अमरावती से शुरू होकर हरिसाल पर जाकर खत्म होती थी। यहां से बैरागढ़ तक पहुंचने के लिए 40 किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था।
लगा कि डॉक्टरी की पढ़ाई अधूरी है, एमडी करने के लिए शहर चले गए
किसी भी सुदूर इलाके में काम करने वाले डॉक्टर को तीने चीजें आनी चाहिएं।पहला, बिना सोनोग्राफी या खून चढ़ाने की सुविधा के प्रसव कराना, दूसरा बिना एक्स-रे के निमोनिया की पहचान करना और तीसरा, डायरिया का इलाज। डॉ. कोल्हे को कहां चैन था। वे तुरंत मुंबई पहुंच गए। वहां पर उन्होंने छह माह तक ये तीन विद्याएं सीखीं। इसके बाद वे बैरागढ़ के लिए वापस चल दिए।
एक बार उनके पास ऐसा केस आया, जिसमें किसी व्यक्ति का बाजू विस्फोट में उड़ गया था। उन्हें सर्जरी का ज्ञान नहीं था। इसे लेकर वे बहुत दुखी हुए। चूंकि वे उस व्यक्ति का इलाज नहीं कर सके थे, इसलिए उनका मन व्यथित हो गया। बतौर डॉ. कोल्हे, मुझे लगा कि ऐसे मरीजों को बचाने के लिए मुझे और पढ़ने की जरूरत है। इसके बाद 1987 में वे एमडी करने के लिए एक बार फिर शहर चल दिए।