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Republic Day: अदम्य साहस का साक्षी रहा 'हिमालय', 'ब्रह्मपुत्र' की गोद बही अटूट बंधन की अश्रुधारा

Sat, 25 Jan 2025 03:21 PM IST
श्वेता महतो एन. अर्जुन, गुवाहाटी

सार

यह कोई कहानी नहीं है बल्कि एक हकीकत है, जो कहानी जैसी ही लगती है। लेकिन यह अद्म्य साहस, बंधन और बहादुरी की धरोहर की कहानी है जो दो फौजियों की कारगिल युद्ध के समय केरन सेक्टर से शुरू होती है। यह कहानी है बलिदानी कैप्टन जिंटू गोगोई और गढ़वाल राइफल्स के कर्नल (तत्कालीन सेकंड लेफ्टिनेंट) राजेश भनोट की।




 
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गणतंत्र दिवस - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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यह दो फौजियों की एक ऐसी कहानी है, जो कारगिल की बर्फ से ढकी पहाड़ियों से शुरू होती है। कश्मीर घाटी के केरन सेक्टर का दुर्गम घाटियां, जहाँ बर्फ से ढकी चोटियाँ आकाश से मिलती हैं, ने 1996 में एक असाधारण रिश्ते की शुरुआत देखी थी। कर्नल (तत्कालीन सेकंड लेफ्टिनेंट) राजेश भनोट को जब 17वीं गढ़वाल राइफल्स में कमीशन किया गया, तो उनकी मुलाकात कैप्टन जिंटू गोगोई से केरन सेक्टर के नाग पोस्ट पर हुई। एक वरिष्ठ और जूनियर अधिकारी के बीच पेशेवर संबंध के रूप में शुरू हुआ, वह देखते ही देखते भातृत्व में बदल गया, जिसने कष्टों को साझा किया, अनगिनत मिशनों और कर्तव्य और बलिदान को देखा।
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बलिदान हुए कैप्टन जिंटू गोगोई, वीर चक्र से सम्मानित
भारतीय रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल अमित शुक्ला कहते हैं, जब 1999 में कारगिल युद्ध शुरू हुआ, 17 गढ़वाल राइफल्स को बटलिक उप-क्षेत्र में तैनात किया गया। कैप्टन गोगोई और कैप्टन भनोट, जो अब कंपनी कमांडर थे, को काला पत्थर (जुबेर हाइट्स) और ट्विन बम्प्स (शांग्रुति रेंज पर) को अपनी गिरफ्त में करने की जिम्मेदारी सौंपी गई थी। चुनौतियां असाध्य थीं, जिसमें धोखेबाज ऊंचाईयां, ठंडी हवाएँ और एक शातिर दुश्मन था। कठिनाइयों का सामना करते हुए, कैप्टन गोगोई ने बेजोड़ साहस का प्रदर्शन किया, और अपने सैनिकों को ऐसे नेतृत्व किया जिसने सभी को प्रेरित किया। 30 जून 1999 को, जब वह अपना उद्देश्य सुरक्षित कर रहे थे, तो उन्होंने देश के लिए अंतिम बलिदान दिया। उनका शहीदी होना केवल एक क्षणिक हानि नहीं था—यह कर्तव्य, सम्मान और नि:स्वार्थ सेवा का प्रतीक बन गया। उनकी असाधारण बहादुरी के लिए, कैप्टन जिंटू गोगोई को मरणोपरांत वीर चक्र से सम्मानित किया गया।

युद्ध के बीच भनोट के घर 'शांग्रुति' बन आई जब नन्हीं परी
इस बीच, कैप्टन भनोट ने अपने सैनिकों का नेतृत्व करते हुए अपने उद्देश्य को सुरक्षित किया और वीरता के लिए सेना पदक प्राप्त किया। युद्ध के बीच कैप्टन भनोट को दो खबरें मिलीं, एक तो भाई सरीखे कैप्टन जिंटू गोगोई के बलिदान होने की और साथ ही मिली एक सूचना, कि उनके घर भगवान ने एक नन्हीं परी को भेजा है। शांग्रुति रेंज के प्रतीकात्मक महत्व को सम्मानित करने के लिए, उनकी यूनिट ने उसे "शांग्रुति" नाम देने का प्रस्ताव रखा, जो विजय और बलिदान की जीवंत याद के रूप में रहेगा, जिसे भनोट ने सहर्ष स्वपीकार कर लिया। इस तरह से नन्हीं परी का नामकरण भी युद्ध के मैदान ही हो गया, अब से नन्हीं परी शांग्रुति कहलाएगी।
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टूटा नहीं प्रेम का बंधन, और प्रगाढ़ हुआ
कैप्टन गोगोई की शहादत के बाद भी, दोनों परिवार गहरे जुड़े रहे। उनका रिश्ता समय और स्थान से परे था। भनोट परिवार के लिए, कैप्टन गोगोई सिर्फ एक युद्ध नायक नहीं थे—वह परिवार का हिस्सा थे। उनकी धरोहर साहस और नि:स्वार्थता की कहानियों के माध्यम से जीवित रही, जो अगली पीढ़ी को दी गई।

कैप्टन जिंटू गोगोई मेमोरियल फुटबॉल टूर्नामेंट
भारतीय सेना ने अपर असम के डिब्रूगढ़ में 2004 में कैप्टन गोगोई की याद को अमर करते हुए कैप्टन जिंटू गोगोई मेमोरियल फुटबॉल टूर्नामेंट की शुरुआत की। उस समय लाइपुली में तैनात कैप्टन भनोत ने टूर्नामेंट के उद्घाटन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सालों बाद, यह टूर्नामेंट एकता का प्रतीक बन गया, जिसने अनगिनत युवाओं को प्रेरित किया और युद्ध नायक की आत्मा को जीवित रखा।

वाह रे!  भगवान...और किस्मत ले आई असम
वाह रे! भगवान तेरी लीला अपरंपार..  किस्मत ने एक और जबरदस्त मोड़ ली... सात सितंबर 2024 को, जिस शांग्रुति नामक रेंज पर, जिस एक नन्हीं परी का नामकरण हुआ था, जिसे उनके पिता ने कब्जा किया था, को चेन्नई के ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी से कमीशन किया गया...यह वही एकेडमी है जहां कैप्टन गोगोई ने कभी ऑलिव ग्रीन पहना था। वह नन्हीं सी गुड़िया अब लेफ्टिनेंट शांग्रुति बन चुकी थीं और आर्मी सर्विस कॉर्प्स में तैनाती मिली। और पहली पोस्टिंग भी मिली तो कहां, पहली पोस्टिंग ही उन्हें असम ले आई, वह भूमि जहां उनका परिवार कैप्टन गोगोई के माध्यम से गहरे से जुड़ा था। अमित शुक्ला कहते हैं, यह तो कुछ भी नहीं, मानो किस्मत और बहुत कुछ देने जा रही थी, भविष्य के गर्भ में क्या छिपा है, कौन बता सकता है। लेफ्टिनेंट शांग्रुति की आश्चर्य का ठिकाना तब नहीं रहा जब उन्हें कैप्टन जिंटू गोगोई मेमोरियल फुटबॉल टूर्नामेंट के 20वें संस्करण की देखभाल की जिम्मा मिला। एक अधिकारी के रूप में वह उसी टूर्नामेंट में लौट आईं, जहां वह चार साल की बच्ची के रूप में गई थीं, और वह कैप्टन गोगोई के परिवार के साथ खड़ी थीं, जो उनके साझा धरोहर की निरंतरता का प्रतीक थी।

मौन आंखों ने बात की ..दिल ने किया संवाद
बीस वर्षों से चली आ रही कैप्टन जिंटू गोगोई ट्रुर्मामेंट में ऐसा कभी नहीं हुआ जो उस दिन हुआ...जब दो परिवार मिले तो ऐसा लगा यह कोई दिव्य पुनर्मिलन हो। लेफ्टिनेंट शांग्रुति और कैप्टन गोगोई के परिवार के साथ उनका दृश्य 25 वर्षों की यात्रा का समापन प्रतीत हुआ। एक ऐसा रिश्ता जो साहस, बलिदान और अटूट बंधनों पर आधारित था। नायकों की धरोहर पीढ़ियों से परे जाती है, और जो लोग उनके साहस से प्रेरित होते हैं, वह उसे आगे बढ़ाते हैं। जैसे ही टूर्नामेंट समाप्त हुआ, लेफ्टिनेंट शांग्रुति ने कैप्टन जिटू गोगोई के माता-पिता के साथ सम्मान से खड़े होकर, गर्व और भावनाओं से भरे दिल के साथ उनका आदर किया। जिंटू गोगोई के माता-पिता भी अपनी लाड़ली बेटी का सानिध्य पाकर भावुक हुए बिना नहीं रहे। कभी चेहरा देखते, कभी बेटी को सहलाते, कभी माथा चुमते... मौन आंखों ने बात की...दिल से दिल का संवाद हुआ... मुंह से कुछ बोले नहीं, लेकिन सारे जहां की बात की।

वर्षों की यादें और मन के बादल उमड़-घुमड़ करने लगे... देखते ही देखते मां की ममता हिलोरे लेने लगी... बह निकली अश्रुधारा...हजारों-हजारों लोग इस ऐतिहासिक और अद्भूत क्षण के गवाह बने...दूर अपनी तेज बेग के लिए जाने जानी वाली ब्रह्मपुत्र आज कुछ शांत थी, शायद वह भी आज की इस मिलन में खलल नहीं बनना चाहती थी...। मानो वह भी अपने बलिदानी बेटे कैप्टन जिंटू गोगोई को मौन और शांत सलामी दे रही हो...। लेकिन वह अब केवल एक युद्ध नायक की बेटी नहीं थी, वह अब एक धरोहर की संरक्षक बन चुकी थी, जो साझा मूल्यों और अडिग बंधनों की स्थाई शक्ति का प्रमाण थी। हिमालय की चोटियों की छांव में, जहां साहस की कहानियां हवाओं में गूंजती हैं, जीवन ने पूर्ण चक्र लिया। कारगिल के रणभूमि से असम के फुटबॉल मैदानों तक, कैप्टन जिंटू गोगोई और कर्नल राजेश भनोट की धरोहर जीवित है, न केवल इतिहास के पन्नों में, बल्कि उन दिलों में जो उनके बलिदान को सम्मानित करते हैं।
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