देशभर में गणतंत्र दिवस की तैयारियां चल रही हैं। हर कोई देशभक्ति के रंग में डूबा हुआ नजर आ रहा है। हमारे देश में बेटा हो या बेटी दोनों को बराबरी के अधिकार दिलाने के लिए हर तरह की पहल की जा रही है। बेटियों की सदियों से चली आ रही खराब स्थिति को दूर करने के लिए सरकार ने बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, सुकन्या जैसी कई योजनाओं की शुरुआत भी की है। लेकिन फिर भी कई मायनों में बेटियां आज भी अच्छी स्थिति में नहीं है।
21 से 26 जनवरी तक पूरा सप्ताह बेटियों के नाम पर रखा गया है। बेटियों को लेकर एक अच्छी खबर नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे (एनएफएचएस) की रिपोर्ट में आई है। रिपोर्ट के मुताबिक देश के करीब 80 फीसदी लोग घर में कम से कम एक बेटी चाहते हैं। एनएफएचएस के सर्वे में पता चला है कि जो लोग बेटियों की चाह रखते हैं उनमें ग्रामीण और गैर पढ़ेलिखे लोग अधिक हैं। रिपोर्ट के अनुसार 83 फीसदी अनपढ़ पुरुष और 74 फीसदी 12वीं पास पुरुष घर में एक बेटी चाहते हैं। वहीं ग्रामीण पुरुषों में ये आंकड़ा 80 फीसदी और शहरी पुरुषों में ये आंकड़ा 75 फीसदी है।
इस सर्वे में 15 से 49 साल की 79 फीसदी महिलाओं और 15-54 साल के करीब 78 फीसदी पुरुषों ने कहा है कि घर में एक बेटी होनी चाहिए। सबसे अच्छी बात ये है कि जो लोग घर में एक बेटी की चाह रखते हैं, उनमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, आर्थिक रूप से पिछड़े लोग और मुस्लिम लोगों की संख्या अधिक है। रिपोर्ट में सबसे अच्छी बात ये है कि जो लोग बेटी चाहते हैं, उनमें शहरी और पढ़ेलिखे लोगों की तुलना में ग्रामीण लोगों की संख्या अधिक है।
अगर महिलाओं की बात करें तो रिपोर्ट के नतीजे कहते हैं कि करीब 85 फीसदी अशिक्षित महिलाएं ऐसी हैं जो बेटियों की चाह रखती हैं। वहीं अगर 12वीं पास महिलाओं की बात करें, तो 72 फीसदी महिलाएं ऐसी हैं जो चाहती हैं कि घर में एक बेटी हो। रिपोर्ट में कहा गया है कि बेटी की चाह रखने वालों की संख्या पहले के मुकाबले अब अधिक बढ़ी है।
सरकार द्वारा बालिकाओं के लिए शुरू की गई कई योजनाओं से सुधार हुआ है। जिसमें से एक है पोषण अभियान। जिसका सीधा असर लिंगानुपात और जन्म एवं जीवन प्रत्याशा दर पर पड़ा है। इस मामले में बीते पांच सालों में अधिक सुधार आया है। जीवन प्रत्याशा दर में भी वृद्धि हुई है। पोषण अभियान की बात करें तो इसके तहत जरूरी पोषक तत्व मुहैया कराए जाते हैं। इसके अलावा देश को 2019 तक खुले में शौच से मुक्त (ओडीएफ) कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर चलाए जा रहे अभियानों से भी काफी सुधार हुआ है। अखिल भारतीय स्तर पर देखा जाए तो जन्म के समय लिंग अनुपात में सुधार देखा गया है।