वहीं, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के सदस्य कमाल फारुकी कहते हैं कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। जिस संसद में देश की गरीबी दूर करने के लिए, लोगों की परेशानियों का जिक्र कर उसका समाधान पाने के लिए और सबका विकास करने के लिए बहस होनी चाहिए वह धार्मिक नारों में उलझकर रह जा रही है। फारुकी ने संसद में दोनों ही नारों को लगाने को गलत बताया और कहा कि यह देश को एक गलत राह पर ले जाने की कोशिश है जिसे हर हाल में रोका जाना चाहिए।
'किसी भी धर्म का नारा लगना उचित'
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी ने संसद में किसी भी धर्म के नारे को लगाना उचित बताया। उन्होंने कहा कि देश की संसद में ही 'धर्म चक्र प्रवर्तनाय' और 'यतो धर्मः ततो जयः' (जहां धर्म होता है, वहीं विजय होती है) लिखा हुआ है। इससे यह साबित होता है कि हमारे संविधान निर्माता धर्म के महत्त्व को समझ रहे थे और इसीलिए उन्होंने संसद में इसको जगह दी। त्रिवेदी के मुताबिक धर्म का अतिवाद बुरा होता है जब वह किसी दूसरे को स्वीकार करने से इनकार कर देता है, लेकिन अगर सभी अपने धर्म के अनुसार सह अस्तित्व को स्वीकार करते हैं तो यह किसी भी प्रकार गलत नहीं है।
किसने क्या नारा लगाया?
लोकसभा में सदन चलने के दूसरे दिन बाकी बचे नवनिर्वाचित सांसदों ने अपने पद की शपथ ली। भाजपा सांसदों सनी देओल, रविकिशन और लाकेट चटर्जी ने अपने पद की शपथ लेने के बाद 'जय श्री राम' और 'वंदे मातरम' के नारे लगाए। वहीं, समाजवादी पार्टी के सांसद शफीकुर रहमान बर्क ने शपथ लेने के बाद वंदे मातरम को इस्लाम के खिलाफ बताया। ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन असदुद्दीन ओवैसी जब शपथ लेने जाने लगे तो भाजपा सांसदों ने जय श्री राम के नारे लगाने शुरू कर दिए। ओवैसी ने उन्हें और अधिक ऐसा करने के लिए कहा और शपथ लेने के बाद 'अल्लाहु अकबर' का नारा लगाया। इसके बाद से ही इन नारों पर चर्चा होने लगी थी।