आशिमा गोयल ने कहा कि मुफ्त सुविधाओं की घोषणाओं के साथ इस तरह की जानकारियां देने से प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद के प्रति प्रलोभन कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकारें जब मुफ्त सुविधाएं देती हैं तो कहीं-न-कहीं से इसकी लागत की भरपाई की जाती है।
मुफ्त रेवड़ियों को लेकर देशभर में चल रही सियासी बहस के बीच आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की सदस्य आशिमा गोयल ने कहा है कि रेवड़ियां (मुफ्त उपहार) कभी मुफ्त नहीं होती हैं। अगर राजनीतिक दल ऐसी योजनाओं की पेशकश करते हैं तो उन्हें मतदाताओं को इनके वित्त पोषण और अन्य पहलुओं के बारे में भी बताना चाहिए। उन्हें मतदाताओं को बताना चाहिए कि मुफ्त सुविधाओं के लिए पैसा कहां से आ रहा है और अर्थव्यवस्था पर इसका क्या असर पड़ेगा।
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गोयल ने रविवार को कहा कि मुफ्त सुविधाओं की घोषणाओं के साथ इस तरह की जानकारियां देने से प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद के प्रति प्रलोभन कम हो जाएगा। उन्होंने कहा कि सरकारें जब मुफ्त सुविधाएं देती हैं तो कहीं-न-कहीं से इसकी लागत की भरपाई की जाती है। लेकिन अगर सार्वजनिक वस्तुओं और सेवाओं पर यह खर्च किया जाए तो इससे क्षमता का निर्माण होगा। उल्लेखनीय है कि इस महीने की शुरुआत में सुप्रीम कोर्ट ने भी तर्कहीन मुफ्त चुनावी उपहारों की जांच के लिए एक विशेष निकाय बनाने का सुझाव दिया था।
कीमतों पर असर, गरीबों को सर्वाधिक नुकसान
गोयल ने कहा, ऐसी हानिकारक सब्सिडी कीमतों को प्रभावित करती है और इससे उत्पादन और संसाधन आवंटन को भी नुकसान पहुंचता है। जैसे मुफ्त बिजली देने से पंजाब में पानी का स्तर गिरा है। उन्होंने कहा, आम जनता को मुफ्त सुविधाएं स्वास्थ्य, शिक्षा और पानी की खराब गुणवत्ता की कीमत पर मिलती हैं। इनसे सबसे ज्यादा गरीबों को ही नुकसान पहुंचता है।
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पीएम ने इस प्रथा पर किया था प्रहार
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में मुफ्त रेवड़ियां बांटने के प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद पर प्रहार करते हुए कहा था कि मुफ्त सुविधाएं देना करदाताओं के पैसे की बर्बादी है। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता है, बल्कि यह भारत के आत्मनिर्भर बनने के अभियान को भी बाधित कर सकता है। इसे आम आदमी पार्टी ने खुद पर निशाना माना था। आप ने हाल ही में पंजाब में मुफ्त बिजली देने की शुरुआत की है। गुजरात में भी मुफ्त बिजली और पानी देने का वादा किया है।
देश का उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन, बढ़ेगा निर्यात
वृहद आर्थिक स्थितियों पर जानी-मानी अर्थशास्त्री ने कहा कि वैश्विक झटकों और नीतिगत दरों में बढ़ोतरी के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में वृद्धि कायम है। अन्य देशों के मुकाबले भारत ने उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन किया है। हमारा निर्यात बढ़ सकता है। उन्होंने कहा, अगर उद्योग लॉकडाउन के झटकों से उबर रहे हैं और कृषि क्षेत्र बेहतर करती है तो घरेलू मांग वैश्विक मंदी को कम कर सकती है।