सुप्रीम कोर्ट ने राज्यसभा चुनाव के बैलेट पेपर में नोटा के विकल्प के लिए चुनाव आयोग की अधिसूचना पर जवाब मांगा है। शीर्ष अदालत ने सोमवार को कहा कि नोटा को प्रत्यक्ष चुनाव में प्रत्येक मतदाता के इस्तेमाल के लिए विकल्प बनाया गया था। राज्यसभा चुनाव में यदि कोई सदस्य पार्टी के मनमाफिक वोट नहीं करता है तो उसे पार्टी निकाल भी सकती है। ऐसे असंवैधानिक कृत्य में एक संवैधानिक अदालत को क्यों पक्ष बनना चाहिए।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पीठ ने पिछले राज्यसभा चुनाव के दौरान गुजरात विधानसभा में कांग्रेस के मुख्य सचेतक शैलेश मनुभाई परमार की याचिका पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इस चुनाव में पार्टी ने अपने निवर्तमान सांसद अहमद पटेल को उम्मीदवार बनाया था। परमार ने बैलेट पेपर में नोटा विकल्प के लिए आयोग की अधिसूचना को चुनौती दी थी।
शीर्ष अदालत ने आयोग से सवाल किया कि नोटा लाने से आप वोट नहीं करने के कार्य को वैध ठहरा रहे हैं। पीठ में जस्टिस एएम खानविलकर और जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ भी थे। पीठ ने कहा कि राज्यसभा तथा विधान परिषदों के चुनाव में ओपन बैलेट वोटिंग प्रणाली के पीछे मकसद भ्रष्ट आचरण के कारण क्रॉस-वोटिंग को रोकना था।
सदस्यों को इन चुनावों में अपनी पार्टी के निर्देशानुसार ही वोट देना होता है। इसमें कोई मतदाता यह नहीं कह सकता कि वह पहली प्राथमिकता किसी उम्मीदवार को देगा और फिर नोटा का विकल्प चुनेगा। कहां वोट देना है और कहां नहीं, यह सदन के सदस्य के दायरे में आता है। चुनाव आयोग नोटा विकल्प देकर अधिसूचना जारी नहीं कर सकता।